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Saturday, October 23, 2010

एक कुल-सा स्नेह




आज फोन पर आदरणीय श्री नीरवजी ने मेरी बात यथार्थ मेडिटेशन इंटरनॅशनल धर्मशाला (हिमाचल) के संस्थापक एवं चेयरमेन श्री प्रशांत योगीजी से करायी। वैसे तो श्री नीरवजी मुझे रोज मसलसल स्नेहते रहते हैं लेकिन उनका स्नेह यहीं तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि दूरस्थ बैठे अपना यथार्थ दर्शन करा रहे श्री योगीजी से भी मेरी फोन पर बात कराकर दिखा दिया कि निश्वार्थ स्नेह भी एक यथार्थ दर्शन का ही अभिन्न अंग है और यही दर्शन है जिसका व्यक्ति आभार व्यक्त करता है। मैं इस कृत के लिए उनका बड़ा आभारी हूँ कि श्री योगीजी बहुत बड़े दार्शनिक, अध्यात्मिक एवं योगी की सात्विक भावना से ओत-प्रोत युगपुरुष एवं संत हैं जो आज हो रहे भौतिक आडम्बरों से, दिखावों से और बाबा तथा बापुओं द्वारा थोपे हुए अन्धानुकरनों से दूर रहने के लिए सजग कर रहे हैं। योगीजी द्रष्टान्ततः यथार्थ दर्शन करा रहे हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व से मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मुझे बातचीत में बड़ा ही स्नेह दिया। उनका यह स्नेह एक कुल-परिवार जैसा मुझे मिला है जो मेरी एक जीवंत यादगार रहेगी। इसके लिए मैं श्री नीरवजी का बहुत आभारी हूँ और श्री प्रशांत योगीजी का भी आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने अपने व्यस्त समय में से कुछ क्षण मुझको अपने से बात करने के लिए दिए। नमन।
भगवान सिंह हंस
आदरणीय पंडितजी का हास्य-व्यंग का आलेख -समय के कसाई के आगे हम सभी बकरें हैं। उन्होंने यह व्यंग भैयाजी की रिटायरमेंट को लेकर किया है। व्यक्ति की रिटायरमेंट और मृत्यु समयबढ है। कर्मचारी की रिटायर्मेंट का समय निश्चित है और जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु का समय भी निश्चित है। उन्होंने ठीक ही कहा है कि समयरुपी कसाई सबको खा जाता है। ऐसा गहरा चिंतन और कोई नहीं कर सकता है और न किसीकी के बस की बात है ,यह तो विश्ववन्दित विद्वान एवं शब्दपारिखी पंडित सुरेश नीरवजी ही कर सकते हैं, बता सकते हैं और कह सकते हैं। उनको बहुत-बहुत बधाई। जय लोकमंगल।
भगवान सिंह हंस

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