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Sunday, October 24, 2010

अर्थ ही धर्म है जिनका

आदरणीय प्रशांत योगीजी.
यथार्थ दर्शन के अंतर्गत आज आपका विचारपरक आलेख पढ़ा- कफन में जेब नहीं होती। अर्थ की निस्सारता को आपने बड़े ही सधे हुए ढ़ंग से प्रतिपादित किया है। लेकिन उन रंगे हुए सियारों को आप क्या कहेंगे जो अपने भक्तों से तो धन की लालसा और कामना को छोड़ने को कहते हैं मगर खुद अपने आश्रमों में अरबों की संपत्ति जोड़कर बैठे हुए हैं। धर्म जिनके लिए कारोबार है। भक्तों को निचोड़ने के लिए जो हर संभव जुगत लगाते हैं। आयर्वेदिक दवाओं से लेकर शहद,पापड़,अगरबत्ती,खड़ाऊं,कुर्ते-पाजामें तक आश्रम  में बनाकर बेच रहे हैं। जगह-जगह प्रवचन के लिए जिनकी मार्केटिंग टीम जाती है और जैसे शहर में कोई  सर्कस आता है तो  उसके टैंट-तंबू गाढ़े जाते हैं उसी तर्ज पर इनके तंबू-पांडाल भी गाड़े जाते हैं। पशुमेले की तर्ज पर भक्त गण हांककर लाए जाते हैं। पांचसितारा आश्रमों में रहनेवाले अपनी चेलियों के साथ किल्लोल-क्रीड़ा में रत इन पाखंडियों का सिर्फ अर्थ ही धर्म है। और इनकेलिए महावीर या बुद्ध अर्थहीन प्रतीक हैं। इन्हें कौन सुधार सकता है। इसके लिए एक जन-जागरण शुरू करना पड़ेगा हम चाहते हैं कि यथार्थ मेडीटेशन इसकी शुरूआत करे। तो एक क्रातिकारी काम हो जाएगा। जरा इस पर आप विचार करें। मेरे प्रणाम..
पंडित सुरेश नीरव
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