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| ग़जल-गजल-गजल-गजल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल |
अपनी नजर में जो कभी अदना नहीं हुए
इस जिंदगी में वो कभी तनहा नहीं हुए
हंसने की आदते मेरी अब तक नहीं गईं
यूं जिंदगी में हाजसे क्या-क्या नहीं हुए
पलकों की छांव की जिसे पल-पल तलाश है
ऐसा भटकता हम कोई सपरा नहीं हुए
ख़ुद अपनी आंच में दिये सा जो जले न वो
अहसास की नजर का उजाला नहीं हुए
सागर हुई हैं लगरें जो सागर में खो गईं
सिमटे रहे जो कतरे वो दरिया नहीं हुए
उन गुलशनों के नाम पर आती हैं रौनकें
जो जलजलों के बाद भी सहरा नहीं हुए
बढ़ते कदम को रोकना जिनका रहा शग्ल
दीवार तो बने कभी रस्ता नहीं हुए
मिलती हैं यहां शौहरतें रुसवाइयों के बाद
गुमनाम ही रहे जो तमाशा नहीं हुए
नींदों के गांव की जिसे हर पल तलाश है
अच्छा हुआ कि ऐसा हम सपना नहीं हुए।
जयलोकमंगल-जयलोकमंगल



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