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Friday, October 22, 2010

दिव्य लीलाओं का क्रीड़ा स्थल


जयलोकमंगल पर इन दिनों काफी नए लोग देखने को मिले। श्री प्रशांत योगी,श्री हीरालाल पांडे और श्री विश्वमोहन तिवारीजी। यह देखकर अच्छा लगा कि ब्लाग की पहुंच व्यापक हो रही है। इसलिए ही लोगबाग इससे जुड़ रहे हैं। पिछले दिनों अध्यात्म का बोलबाला ज्यादा रहा। फिर साहित्यिक सामग्री आई। कुछ बिंदास फोटो भी आए। योगीजी का लेख ठीक लगा और आपने उस पर जो टिप्पणी की वह और भी बढि़या लगी। रमाद्विवेदी,मधु चतुर्वेदी और नीलमजी की गजले बहुत अच्छी हैं और आज आपका व्यंग्य तो बहुत ही मारक है,खासकर ये पीस-
छोटे बाबू ने बड़े बाबू के सामने भैयाजी के स्याह जीवन पर पूरी निष्ठा से रोशनी डालते हुए गुटखारुद्ध गले से कहा- हम लोगों की नज़र मे शराफत के मामले में भैयाजी नारायणदत्त तिवारीजी की नस्ल के जीव हैं। भैयाजी ने हमेशा काम को (काम,क्रोध और लोभ वाले काम को भी) पूजा और कार्यस्थल को पूजा स्थल ही माना है। यह दफ्तर पूरे तीस साल तक भैयाजी की दिव्य लीलाओं का क्रीड़ा स्थल रहा है। दफ्तर की हर फाइल को भैयाजी ने पवित्र धार्मिक ग्रंथ माना और उसे लाल कपड़े में बांधकर हर बुरी नजर से बचाकर रखा। किसी को भी इन्हें छूकर अपमानित करने का उन्होंने मौका नहीं दिया। और-तो-और नौकरीपर्यंत खुद भी नहीं छुआ। जीर्ण-शीर्ण वयोवृद्ध फाइलों को पूरे धर्मभाव से इन्होंने समय-समय पर पवित्र नदियों में विसर्जित कर अपना सरकारी धर्म निभाया। इसके लिए ये कई बार हरिद्वार भी गए मगर सरकार से इसके लिए कभी खर्चा भी नहीं लिया। ऐसे नैतिक और निष्ठावान कर्मनिष्ठ भैयाजी पर हमें गर्व है।
आप ऐसे ही धारदार व्यंग्य लिखते रहें,और हमें दिखते रहें हमारी शुभकामनाएं..
मुकेश परमार
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