राम का आस्तिक मत -सत्य का पालन हि स्वीकार। नृप धर्म सनातन आचारा। ।
राज्य धर्म है सत्य स्वरूपा। सत्य में आदर लोक भूपा । ।
राम मुनि जावालि के नास्तिक मत का खंडन करते हुए कहते हैं कि हे मुनि! सत्य का ही पालन किया जाता है। नृपधर्म सनातन आचार है। राज्य-धर्म सत्यस्वरूप है। सांसारिक राजा सत्य में ही आदर पाता है।
रिषी संत देव जन पुकारा। सदा सत्य का ही सत्कारा। ।
सत्यव्रती पाय परम धमा। मरकर जीता युग अभिरामा। ।
और ऋषि, मुनि , संत, भक्त आदि कहते हैं कि सदैव सत्य का ही सत्कार किया जाता है। तथा सत्यव्रती को परमधाम मिलता है। वह सुन्दर पुरुष मरकर भी युग-युग जीता है।
झूंठे से सब हों भयभीता । जैसे सर्प से भय प्रतीता। ।
सत्य हि धर्म कि पराकाष्ठा। वो ही सत्य मूल की आस्था। ।
हे मुनिजावालि! झूठे से सब वैसे ही भयभीत होते हैं जैसे सांप से भयभीत होते हैं। सत्य ही धर्म की पराकाष्ठा है। और वह सत्य ही मूल की आस्था है।
सत्य ही ईश है संसारा । सत्य धर्म का ही आधारा। ।
इससे बड न परमपद कोई। सत्य ही प्रतिष्ठित जग होई। ।
एवं संसार में सत्य ही ईश्वर है और सत्य ही धर्म का आधार है। सत्य से बड़ा कोई परमपद नहीं है। संसार में सत्य ही प्रतिष्ठित होता है।
दोहा - तप अरु दान यग्य वेद, इनका यह आधार ।
वे ही सत्यनारायण , करते भव से पार । ।
हे मुनि! तप,दान,यग्य , वेद आदि का सत्य ही आधार है। वे ही सत्यनारायण भव से पार करते हैं।
रचयिता -भगवान सिंह हंस
प्रस्तुति - योगेश विकास
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