जो कुछ कहो कुबूल है तक़रार क्या करूं
शर्मिन्दा अब तुम्हें सरे-बाज़ार क्या करूं।
मालूम है कि पार खुला आसमान है
छूटे नहीं हैं ये दरो-दीवार क्या करूं।
इस हाल में भी सांस लिए जा रहा हूँ मैं
जाता नहीं है आस का आज़ार क्या करूं।
फिर एक बार वो रुख़े-मासूम देखता
खुलती नहीं हैं चश्मे-गुनहगार क्या करूं।
ये पु-सुकून सुबह, ये मैं, ये फ़ज़ा शऊर
वो सो रहे हैं अब उन्हें बेज़ार क्या करूं।
अनवर शऊर
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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