महाकवि भगवान सिंह हंस की टिप्पणी बड़ी सारगर्भित हैजो इन्होंने लज्जा एवं मन (प्रशांत योगी ) और बच्चा एवं निर्मन (पंडित सुरेश नीरव) पर की है। क्योंकि जहाँ मन की एक हद है , एक सीमा है वहाँ सत्य का दर्शन दुर्लभ है। यदि एक बच्चा नंगा है, वह निर्मन है। वह कहाँ है , कैसे है, उसको इस बात का बोध नहीं हैइसलिए काम ,क्रोध और लोभ से दूर है। उसकी जिज्ञासा बेहद है , वह असीम है और जो असीम है वही अनंत है और जो अनंत है वही सत्य दर्शन है। अतः सत्य दर्शन के लिए निर्मन होना अपरिहार्य है। बहुत अच्छी लगी टिप्पणी। बधाई। मेरे नमन। डा० रमा द्विवेदीजी की कविता बहुत अच्छी है, उन्हें बधाई।
डा० मधु चतुर्वेदीजी के दोहे और डा० प्रेमलता नीलम की गजल बहुत अच्छी लगी। बधाई।
योगेश विकास
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