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Friday, October 22, 2010

दुर्दांत संयम के मालिक


आदरणीय पंडितजी
आपका व्यंग्य बहुत धांसू है। पढ़कर मजा-ही-मजा आ गया। आप इतनी पकड़ कहां से बरामद करते हैं। मैं तो ये सोच-सोचकर ही हैरान अब उधारखाऊ व्यक्ति का इतना रोचक वर्णन आप के ही बूते की बात है-
भैयाजी..उधार लेने को सदैव पुरुषार्थ मानते थे और उधार वापसी को एक जघन्य पाप समझते थे। उधार वापस कर उन्होंने कभी अपने किसी शुभचिंतक को भूलकर भी शर्मिंदा नहीं किया। ऐसे दूषित विचारों से भैयाजी हमेशा ही दूर रहे। कभी किसी ने उधार वापसी का तकाजा कर भैयाजी को बरगलाने की शरारत की भी तो पूरी विनम्रता के साथ दृढ़ता दिखाते हुए भैयाजी ने अपने को धर्मभ्रष्ट होने से बचाते हुए दुर्दांत संयम का परिचय देकर सभी को चकित कर दिया।
आपके चरणों में चांडाल के प्रणाम..
ओमप्रकाश चांडाल0000000000000ओमप्रकाश चांडाल0000000000000000

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