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Thursday, November 3, 2011

वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।


राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त
भावांजलि-
हिंदी कविता के तीर्थ पुरुषःदद्दा मैथिलीशरण गुप्त
पंडित सुरेश नीरव
बुंदेलखंड की माटी की ये खासियत है कि इसमें हमेशा से देशप्रेम की पावन सौंधी गंध आती रही है। इतिहास के हर दौर में वीरता के माथे पर इस पावन माटी ने राष्ट्रीयता के चंदन का लेप किया है। मुगलकाल में छत्रसाल और अंग्रेजों के समय में झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने शस्त्र पराक्रम से यदि देश के स्वाभिमान का ध्वज ऊंचा रखा तो स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी लेखनी को मशाल बनाकर, भारतीय संस्कृति और इतिहास के मानवीय मूल्यों को सृजन में ढालकर कविश्रेष्ठ मैथिलीशरण गुप्त ने परतंत्रता के अंधेरे में भटकते भारतवासियों के हृदय में स्वदेश प्रेम का दीपक जलाकर नव-स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया। यह देश के लिए कुछ करने की भावना ही थी जिसने पहले इन्हें क्रांतिधर्मी पत्रकार और स्वतंत्रता के प्रखर प्रवक्ता कानपुर से छपनेवाले प्रताप के संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी के निकट ला दिया। यह दौर था-सन,1915 का। जब भारतीय राजनीति के संसार में महात्मा गांधी के प्रादुर्भाव की सिर्फ आहटें ही टहलना शुरू हुईं थीं। और देश की स्वतंत्रताप्रेमी जन-चेतना के चहेते नायक लाल-बाल और पाल यानी कि लाला लाजपतराय, बालगंगाधर तिलक और विपिनचंद पाल हुआ करते थे। लाल-बाल-पाल की हुंकार और विद्यार्थीजी के प्रताप अखबार में क्रांतिकारी लेखनी की टंकार से देश की सभी दिशाएं प्रकंपित हो रही थीं। तभी बंबई से लौटते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी भारतभारती-जैसी अग्निधर्मी रचना के ओजस्वी और तेजस्वी रचनाकार से मिलने चिरगांव रुके। बेतवा के मोहक आंचल में दो प्रज्ज्वलित दीप मिलकर एकाकार हुए। प्रकाश से प्रकाश मिलकर बहुगुणित हुआ और प्रताप के पृष्ठों पर कविता की शक्ल में स्वदेश का स्वाभिमान आलोकित होने लगा। 12 वर्ष की अल्पवय से कविता की साधना करनेवाला बुंदेलीकिशोर मैथिलीशरण अब 29 साल का परिपक्व काव्य-योद्धा बन चुका था। धोती,कुर्ता,रुई की बंडी और ललाट पर वैष्णवी बिंदी धारण किए एक अविचल क्रांतिदूत। स्वराज क्रांति के रणक्षेत्र में राष्ट्रीयता से ओतप्रोत विचारधारा का भारतभारती के जरिए सृजन-शंखनाद करता हुआ। जिसकी काव्य-पंक्तियां स्वतंत्रता का नवमंत्र बनकर भारत की तरुणाई में देशप्रेम का संचार करने लगीं-
जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
  • यह वो दौर था जब खड़ीबोली को साहित्य में बड़े जतन से खड़ा किया जा रहा था। इससे पहले सिर्फ ब्रजभाषा ही साहित्य-संपन्न भाषा हुआ करती थी। सरस्वती के यशस्वी संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनाकारों से खड़ीबोली में लिखने का आह्वान कर रहे थे। यह एक चुनौती थी। दद्दा मैथिलीशरण गुप्त ने इस चुनौती को बखूबी स्वीकारा। यह कहना कतई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि खड़ीबोली काव्य के अव्वल और खरे सिक्के मैथिलीशरण गुप्त की सृजन-टकसाल से ही ढलकर निकले। 1909 में आपका पहला काव्य-संग्रह- जयद्रथवध आया। जयद्रथवध की लोकप्रियता ने उन्हें लेखन और प्रकाशन की  अनंत और अखंड प्रेरणा दी। जिसके परिणामस्वरूप साकेत-जैसे महाकाव्य और फिर जयद्रथ वध, भारत-भारती, पंचवटी, यशोधरा, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्ध्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल, जय भारत, झंकार,पृथ्वीपुत्र, मेघनाद वध, मैथिलीशरण गुप्त के नाटक, रंग में भंग, राजा-प्रजा, वन वैभव, विकट भट, विरहिणी व्रजांगना, वैतालिक, शक्ति,सैरन्ध्री, स्वदेश संगीत, हिडिम्बा, हिन्दू-जैसे उल्लेखनीय खंड काव्यों की रचना हुई।
 ठीक वैसे ही जैसे गोस्वामी तुलसीदास ने साहित्यसंपन्न संस्कृत भाषा के वर्चस्व को नकारते हुए अबधी में रामचरित मानस लिखकर सृजन की एक नई जमीन तैयार की वैसे ही खड़ी बोली में राम के चरित को जनमानस में पहुंचाने का काम कविश्रेष्ठ मैथिलीशरण गुप्त ने किया। इसीलिए मैथिलीशरण गुप्तजी तुलसीदासजी की ही तरह लोकप्रिय होने के साथ-साथ पूज्यनीय भी हुए। खड़ीबोली को काव्य भाषा बनानेवाले वे प्रथम कवि हैं। इसका आशय यह हरगिज नहीं कि वे ब्रजभाषा के विरोधी थे। गुप्तजी तो स्वयं प्रारंभ में ब्रजभाषा में ही लिखा करते थे। इतनी ही नहीं गुप्तजी के पूज्य पिताजी-रामचरण दास कनकने भी बुंदेली और ब्रज में कविताएं लिखा करते थे।  भगवान राम गुप्तजी के मन-वचन-कर्म के आराध्य थे। मां कौशल्या देवी। पिता रामचरणदास। मानस पिता-मर्यादा पुरुषोत्तम राम। हर क्षण-हर पल मन में रामधुन गूंजती रहती थी। हो सकता है यह अंतस की अनवरत-अघोषित रामधुन ही रामराज्य लाने को प्रतिज्ञाबद्ध महात्मा गांधी के पास गुप्तजी को ले जाने का निमित्त बनी हो। मर्यादा पुरुषोत्तम राम कवि मैथिलीशरण गुप्त की अंतरआत्मा की आवाज थे। अंतरआत्मा की आवाज गांधीजी के लिए भी एक महत्वपूर्ण मूल्य था। जिसका पालन उन्होंने जीवन पर्यंत किया। परंपरा कवि मैथिलीशरण गुप्त के लिए संस्कृति की गंगोत्री रही है। वह परंपरा जो अंधविश्वास और लचर रूढियों का निर्वहन नहीं करती बल्कि चारित्रिक शुचिता और व्यावहारिक इकहरापन जिसका वैशिष्टय है। वचनबद्धता,बड़ों का आदर,सदभाव के ताने-बाने से बुना संयुक्त परिवार और देश की अस्मिता को सर्वोपरि मानना इनकी परंपरा के बुद्धमूल तत्व रहे हैं। आज जब कि उपभोक्ता संस्कृति और बाजारवाद के दबाव में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं ऐसे में गुप्तजी के रचनालोक की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। साकेत महाकाव्य होने  के साथ-साथ दशरथ का संयुक्त परिवार भी है। जिसका हर सदस्य मर्यादा के शिखा-सूत्र से बंधा हुआ है। राम उनके आराध्य हैं। गुप्तजी का तन-मन राम के ही रंग में रंगा रहता है। और यह रंग द्वापर में भी फीका नहीं पड़ता है। तभी तो वह कृष्ण को भी राम के रंग में रंग देते हैं-
धनुर्बाण या वेणु तो श्याम रूप के रंग
इन पर चढने से रहा राम दूसरा रंग
दद्दा मैथिलीशरण गुप्त बहुमुखी रचनाकार होने के साथ-साथ बहुभाषाविद भी थे। इसीलिए तो अनुवाद को भी वे इतना सरस और स्वाभाविक बना दिया करते थे कि पढ़नेवाले को इसका तनिक भी आभास नहीं हो पाता था कि वह मूल रचना पढ़ रहा है या उसके अनुवाद का पाठ कर रहा है। बांग्लाभाषा के मेघनाथ-वध और ब्रजांगना तथा संस्कृत के स्वप्नवासवदत्त इस सरस अनुवाद कला के अप्रतिम अदाहरण हैं। मैथिलीशरण गुप्तजी की रचनाओं की सुगंध में डॉ.राजेन्द्रप्रसाद,जवाहरलाल नेहरू,विनोबा भावे खूब डूबे। गांधीजी तो दद्दा के काव्यालोक से इतने प्रभावित थे कि सन 1936 में उन्होंने स्वयं इस ओजस्वी कवि को राष्ट्रकवि का संबोधन प्रदान किया। भारत सरकार ने जहां दो बार राज्यसभा का सदस्य और 1954 में पद्मविभूषण का अलंकरण देकर भारतीय संस्कृति के इस अमर काव्य गायक की कालजयी लेखनी को सम्मानित किया तो वहीं मंगलाप्रसाद पारितोषक,साहित्यवाचस्पति और काशी विश्व विश्वविद्यालय ने डी.लिट. की मानद उपाधि देकर मां सरस्वती के इस वरदपुत्र के प्रति विभिन्न नामचीन संस्थाओं ने अपना सम्मान प्रदर्शित किया। दिनकरजी के शब्दों में गुप्तजी के काव्य के भीतर भारत की प्राचीन संस्कृति एक बार फिर तरुणावस्था को प्राप्त हुई थी। अपने 59 वर्षों के सृजनकाल में गुप्तजी ने गद्य, पद्य, नाटक, मौलिक तथा अनूदित सब मिलाकर लगभग 74  अमर कृतियां हिंदी को प्रदान की हैं। जिनमें 02 महाकाव्य, 20 खंड काव्य, 17 गीतिकाव्य, 04 नाटक और गीतिनाट्य हैं।
 राष्ट्रीयता की वह ज्योति जो 03 अगस्त,1886 को चिरगांव जिला झांसी में मां कौशल्या की तीसरी संतान के रूप में इस धरा पर अवतरित हुई थी वह पूरे 78 वर्ष तक भारतभूमि को आलोकित करते-करते 12 दिसंबर 1964 को पुनः महाज्योति में विलीन हो गई। मगर इनका सृजन-संसार हिंदी-वांग्मय का अप्रतिम तीर्थ होने का दर्जा आज भी रखता है। जब तक भारतवासियों में भारतीयता का भाव रहेगा मानस भवन में आर्यजन भारतभारती के इस अनूठे सर्जक को तब तक अनवरत याद करते रहेंगे।
आई-204,गोविंदपुरम,ग़ाज़ियाबाद
मोबाइल-09810243966
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पंडित सुरेश नीरव
मध्यप्रदेश ग्वालियर में जन्मे बहुमुखी रचनाकार पंडित सुरेश नीरव की गीत-गजल,हास्य-व्यंग्य और मुक्त छंद विभिन्न विधाओं में सोलह पुस्तकें प्रकाशित हैं। अंग्रेजी,फ्रेंच,उर्दू में अनूदित इस कवि ने छब्बीस से अधिक देशों में हिंदी कविता का प्रतिनिधित्व किया है। हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह की मासिक पत्रिका कादम्बिनी के संपादन मंडल से तीस वर्षों तक संबद्ध और सात टीवी सीरियल लिखनेवाले सृजनकार को भारत के दो राष्ट्रपतियों और नेपाल की धर्म संसद के अलावा इजिप्त दूतावास में सम्मानित किया जा चुका है। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा आपको मीडिया इंटरनेशनल एवार्ड से भी नवाजा गया है। आजकल आप देश की अग्रणी साहित्यिक संस्था अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।
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