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Friday, April 20, 2012

यों तो मिलीं हजारों नज़रें

आदरणीय गौड़ साहब.
बहुत ही सुंदर गीत आपने पढ़वा जिया। मन गीत-गीत गो गया। क्या लिखते हैं आप। आपकी लेखनी को प्रणाम। शत-शत प्रणाम..खासकर इन पंक्तियों का तो जवाब ही नहीं..
यों तो मिलीं हजारों नज़रें
पर न कहीं वह नज़र मिली
चाहा द्वार तुम्हारे पहुंचूं
पर न कहीं न वह डगर मिली
तुम कहते याद न हम आये
हम कहते कब बिसरा पाए
सारी उमर लिखे ख़त इतने
स्याही कलम तमाम हुई ।

पंडित सुरेश नीरव
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