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Friday, May 4, 2012

अपना तो मिले कोई (ग़ज़ल संग्रह) शायरः देवमणि पांडेय


अपने दौर की जद्दोजहद को इशारों की जुबान में कहती ग़ज़लें
अपना तो मिले कोई (ग़ज़ल संग्रह)
शायरः देवमणि पांडेय
प्रकाशकःअमृत प्रकाशन,शाहदरा,दिल्ली-32
पृष्ठः108,मूल्यः150 रुपये

अपना तो मिले कोई देवमणि पांडेय का ताज़ा ग़ज़ल संग्रह है। संग्रह की ग़ज़लें उर्दू की चाशनी और हिंदी की मिठास से लवरेज़ ऐसी ग़ज़लें हैं जो पुरअसर जज्बात और पुरअसर लहज़े के साथ-साथ जबान की लताफत और एहसास की शगुफ़्तगी से बाशऊर लैस हैं। इन ग़ज़लों से रू-ब-रू होने के बाद एक बात सामने आती है कि औसत हिंदी ग़ज़लकारों  से अलग देवमणि ने बह्रों की बारीक़ जानकारी के बूते ग़ज़लों को बेवज्नी की चूक से तो बचाया ही है साथ-ही-साथ शब्दों को इस अंदाज़ से ग़ज़लों में पिरोया है कि वे हर जाबिए से ग़ज़ल की जुबान का हिस्सा बन जाते हैं। और ख़ास बात ये भी कि ज़िदगी का कोई तजुर्बा ऐसा बचा नहीं है,जहां तक इनके अशआर पहुंचे न हों। वो भी बिना किसी शोर-शराबे के। एक मुकम्मिल खामोशी के साथ। ऐसी खामोशी जो एक-एक लफ्ज़ को इतनी चुप्पी से पीती है कि किसी आवाज़ का कोई दख़्ल इसे सहन नहीं। अहसास की जमीन पर एक बामानी खामोशी की टहल हैं ये ग़ज़लें। जो तनहाई से बतियाती है-
खामोशी भी एक सदा है, अकसर बातें करती है
तुम भी इसको तनहाई में सुना करो तो बेहतर है।
ऐसा लगता है जैसे अपना तो मिले कोई के जरिए देवमणि ने लम्हों की हथेली पर तमाम मुख्तलिफ जाबियों के साथ जब और जहां जैसे भी दस्तख़त किये उन दस्तखतों के नक्शो-निशान ही कहीं धीरे से शाइरी बन गए हैं। और वो भी उन हालातों में जहां-
जिस्म है लिबास काग़ज का
हाथ में एक दिया सलाई है।
हज़ारहा रातों की बेचैन करवटों को सीने में छुपाए बदमिजाज़ लम्हें तुनक मिजाज़ी और तुर्शीपन के साथ-साथ कहन और लहजे में बाकपनभरी एक ऐसी खुद्दारी ला देते हैं जो इन ग़ज़लों को तमाम भीड़ से अलग कर देते हैं-
मुझे उम्मीद अगर है तो सिर्फ़ ख़ुद से है
सब अपने वास्ते जिंदा है कोई क्या देगा
अपने दौर की जद्दोजहद को शाइस्तगी और खुद्दारी के साथ इशारों की जुबान में कह देने का एक अलग अंदाज़ तो इन ग़ज़लों में है ही इसके साथ रदीफों की ऐसी झांझरें भी हैं जिसकी नग़मगी गिनायत और थरथराहट सोच में मुहावरेबाजी बनकर ढल जाती है-
क्या कहें कुछ इस तरह अपना मुकद्दर हो गया
सर को चादर से ढका तो पांव बाहर हो गया।
इस तरह असरी तकाज़ों को फ़नकाराना चाबुक-दस्ती के साथ ग़ज़ल के पैमाने में कुछ इस तरह ढाला गया है कि वे आज के दौर की सच्चाइयों में तब्दील हो जाते हैं। कुल  मिलाकर ये ग़ज़लें छीजते रिश्तों में अपनापन तलाशने की एक मुख्तर-सी कोशिश हैं जो लफ्जों के जरिए इंसानियत की पहरेदारी के लिए बेहद जरूरी भी है।
-सुरेश नीरव
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