भाई चांडालजी, आप तो कोई जासूस मालुम पड़ते हैं,जो आपको इतनी जल्दी खबर मिल गई। कमाल हो भाई...बधाई...बधाई। और मकबूलजी आपने राज मणिजी की लघुकथा पर जो टिप्पणी की है उस पर मुझे कहना पड़ेगा किकौन है सारी फसल जो इस देश की है खा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया
शिकवा था जनरैल को टाइटलर के जुल्म से
और लुंगी वाला मिनिस्टर जूता यूं ही खा गया
जब से बस्ती में हमारी एक थाना है खुला
दूर तक दिखता नहीं दूध का कोई धुला
जुर्म के दंगल में अब्बल अपना पप्पू आ गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया।
मरते हुए से शेख को इश्क का दौरा पड़ा
खांसते ही खांसते टूटा था उसका नड़ा
पांचवी शादी का नुस्खा ज्योतिषी बतला गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया।
पं. सुरेश नीरव
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