ज़िन्दगी तुझ को मनाने निकले
हम भी किस दर्ज़ा दीवाने निकले।
कुछ तो दुश्मन थे मुखालिफ़- सफ में
कुछ मेरे दोस्त पुराने निकले।
नज़र- अंदाज़ किया है उसने
ख़ुद से मिलने के बहाने निकले।
बे- बसारत है ये बस्ती यारो
आईना किसको दिखाने निकले।
इन अंधेरों में जीयोगे कब तक
कोई तो शम्मा जलाने निकले।
अमीर कज़लबश
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
5 comments:
कुछ तो दुश्मन थे मुखालिफ़- सफ में
कुछ मेरे दोस्त पुराने निकले।
नज़र- अंदाज़ किया है उसने
ख़ुद से मिलने के बहाने निकल
कई बार पढा गज़ल को लाजवाब है पूरी गज़ल उपर के दो शेर याद कर लिये गुनगुना रही हूँ । धन्यवाद्
अमीर भाई ने बहुत खूब कहा है।
शुक्रिया, उन्हें पढवाने का।
जिसपर हमको है नाज़, उसका जन्मदिवस है आज।
कोमा में पडी़ बलात्कार पीडिता को चाहिए मृत्यु का अधिकार।
nirmala kapila ji,
amir kazalbash ki ye gazal mujhe bhi bahut pasand hai,shukriyaa
maqbool
nirmala kapila ji,
amir kazalbash ki ye gazal mujhe bhi bahut pasand hai,shukriyaa
maqbool
bahut dilkash ghazal aur shayar to lajwab hain hii.
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