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Wednesday, December 16, 2009

अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

आदरणीय नीरवजी एवं साथियों

लोकमंगल दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है । इसके लिए आप सभी को बधाई।

प्रदीपजी , म्रगेन्द्र मकबूल जी , हंस जी, राजमणि जी , पुरशोतमजी , अरविन्द जी , मधु चतुर्वेदी जी , वेदना जी , विपिन चतुर्वेदी जी और भी कई महानुभावों की उपस्थिति से ब्लॉग पर बहार आई हुई है। नीरवजी की हजामत तो कहर ढा रही है। खुदा करे जोरे कलम और ज्यादा। आज आपकी खिदमत में एक ग़ज़ल पेश है, मुलाहिजा हो ...

आज के दौर में ए दोस्त ये मंज़र क्यूँ है

ज़ख्म हर सर पे हर एक हाथ में पत्थर क्यूँ है

जब हकीक़त है कि हर जर्रे में तू रहता है

फिर ज़मीन पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी

अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

ज़िंदगी जीने के काबिल ही नहीं दोस्त

वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

प्रस्तुति : अनिल (१६-१२-२००९ , ४.२० सायं )

1 comment:

अजय कुमार झा said...

वाह सर बडी खूबसूरत गज़लें हैं कमाल है कमाल