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Tuesday, December 22, 2009

आग है, पानी है, मिटटी है, हवा है मुझ में

भाई चांडाल जी ग़ज़ल आप को पसंद आई। शुक्रिया। वैसे अहमद फ़राज़ साहब बेहतरीन शायर हैं और मुझे बेहद पसंद भी। लिहाज़ा गाहे-बगाहे उन की गजलें पेश कर देता हूँ। आज जनाब कृष्ण बिहारी नूर की एक ग़ज़ल पेश करता हूँ।
आग है, पानी है, मिटटी है, हवा है मुझ में
और फिर मानना पड़ता है, ख़ुदा है मुझ में।

अब तो ले-दे के वही शख्स बचा है मुझ में
मुझ को मुझ से जुदा कर के जो छुपा है मुझ में।

जितने मौसम हैं, सब जैसे कहीं मिल जाएँ
इन दिनों, कैसे बताऊँ, जो फ़िज़ा है मुझ में।

आईना ये तो बताता है, के मैं क्या हूँ लेकिन
आईना इस पे है ख़ामोश, के क्या है मुझ में।

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ नूर
मैं कहाँ तक करूँ साबित, के वफ़ा है मुझ में।
मृगेन्द्र मक़बूल

2 comments:

निर्मला कपिला said...

आग है, पानी है, मिटटी है, हवा है मुझ में
और फिर मानना पड़ता है, ख़ुदा है मुझ में।

अब तो ले-दे के वही शख्स बचा है मुझ में
मुझ को मुझ से जुदा कर के जो छुपा है मुझ में।
बहुत खूब धन्यवाद इस सुन्दर गज़ल के लिये।

Maqbool said...

shukriyaa nirmalaa kapilaa ji.
maqbool