तेरी खुशबू नहीं मिलती , तेरा लहजा नहीं मिलता
हमें तो शहर में कोई तेरे जैसा नहीं मिलता
यह कैसी धुंध में हम तुम सफ़र आगाज़ कर बैठे
तुम्हें आंखें नहीं मिलती हमें चेहरा नहीं मिलता
हर एक तदबीर अपनी रैगाँ तेरी मोहब्बत में
किसी भी ख्वाब को ताबीर का रास्ता नहीं मिलता
ज़माने को करीने से वो अपने साथ रखता है
मगर मेरे लिए उसको कोई लम्हा नहीं मिलता
प्रस्तुति: अनिल (०६.०२.२०१० सायं ५.१५ बजे )
3 comments:
यह कैसी धुंध में हम तुम सफ़र आगाज़ कर बैठे
तुम्हें आंखें नहीं मिलती हमें चेहरा नहीं मिलता
बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने वाह...हर शेर लाजवाब है...दाद कबूल करें.
नीरज
ab aap ko milta he hamara pyar bhara comments
amrit 'wani'
यह कैसी धुंध में हम तुम सफ़र आगाज़ कर बैठे
तुम्हें आंखें नहीं मिलती हमें चेहरा नहीं मिलता
waah bahut hi khoobsoorat sher hai.
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