दोस्तों, नीरव जी ने ब्लॉग पर मेरी तस्वीर आखिर चस्पां कर ही दी । दरअसल बचपन से ही नाज़ुक तबियत पाई है , मुझे ज़माने की नज़र जल्दी लग जाती है । इसीलिए नीरव जी से कहा भी था कि रहने दीजिये या फिर सात नीम्बू और इक्कीस हरी मिर्च मेरी तस्वीर के साथ जरूर लगा दें , लेकिन वो भी अपने कौल और ख्याल के पक्के है । खैर , आज आपकी खिदमत में राकेश कौशिक की एक कविता पेश कर रहा हूँ, गौर फरमाएं...
अश्वत्थामा मारा गया
नर या कुंजर
तुमने तो सत्य ही बोला था
युधिष्ठिर
किन्तु वे
तुम्हारे ही साथी थे धनुर्धर
जिन्होंने गुंजाया था शंख-स्वर
जब तुमने कहा था -
नर या कुंजर ।
ठीक है
तुम सत्यव्रती बने रहे
और काम भी हो गया
युद्ध जीत गए, दुनिया में
बड़ा नाम हो गया
किन्तु उस क्षण
जो संप्रेषित हुआ था
तुम्हारे द्वारा
तुम्हें पता था
असत्य था
गुरु द्रोण
पुत्र - वध सुन कर नहीं मरे
शिष्य का छद्म सत्य देख
लज्जा से
देह छोड़ चले गए।
प्रस्तुति: अनिल (०९.०२.२०१० अप ३.०० बजे )
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