अरविंद चतुर्वेदीजी आपने बजरिए ग़ज़ल जो हजामत नेताओं की हजामत बनाई है वह काबिले तारीफ है। इस शेर का तो जवाब ही नहीं है-
एक बार हम तुम्हे जिताकर धन्य हुए,
अब मत मांगो वोट दुबारा नेताजी.।
अशोक मनोरम जी आपने प्यार की खूब अच्छी परिभाषा दी है। इन पंक्तियों का तो जवाब ही नहीं है-
प्यार की बात बड़ी मीठी-मीठी लगती है।
प्यार हो जाए तो भूख नहीं जगती है।
प्यार को दूर से देखो तो मजा आता है।
प्यार को पदे$ मे रखो तो सजा पाता है
प्यार है हीर की पूजा, लैला की इबादत है।
भाई प्रदीप शुक्लाजी आपने शरद पंवार पर अच्छा व्यंग्य साधा है खासकर इन पंक्तियों पर-
अब देखना यह है की अगला नंबर किस वस्तु का आता है. अगर यही हाल रहा तो शायद एक दिन श्री महंगाई मंत्री को पद्म विभूषण से अलंकृत करना पड़ेगा.
अनिलजी अच्छी ग़ज़ले दे कहे हैं।
सभी का धन्यवाद..
पं. सुरेश नीरव
No comments:
Post a Comment