बहुत दिनों से चुपचाप जयलोकमंगल पढ़ रहा था। समय-समय पर अपनी प्रतिक्रिया भी टेलीफोन पर पं। सुरेश नीरव को दे दिया करता था। एक-दो बार उन्होंने मुझे मेंबर बनाने की रिक्वेस्ट भी भेजी मगर कभी समयाभाव और कभी अधिक व्यस्तता के कारण मैं अपनी स्वीकृति भेज दी नहीं पाया लेकिन आखिर वह दिन भी आ गया कि आखिर मैं भी बन गया लोकमंगलकारी। मुझे लोकमंगल की नागरिकता मिल गई है यह मेरे लिए खुशी की बात है। कोशिश करूंगा कि कि गाहे-बगाहे कुछ लिखता रहूं बाकी लोगों के विचार तो पढ़ता ही रहता हूं...और पढ़ता ही रहूंगा। सभी बंधुओं को पालागन और सुरेशजी को इटली यात्रा की बधाई।
ज्ञानेन्द्र चतुर्वेदी (फरौली)
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