नीरवजी आपका यात्रा संस्मरण इटली पर पढ़ा। लगा जैसे मैं खुद फिर से इटली पहंच गया हूं। मकबूलजी की ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी। मुनीन्द्रजी ने अच्छे मुद्दे उठाए हैं। लोकमंगल का दायरा बढ़ता जा रहा है यह देख-सुनकर अच्छा लगता है। मैं इनदिनों बाहर हूं पर भावनात्मकरूप से लोकमंगल से जुड़ा ही रहता हूं। सभी बंधुओं को नमस्कार॥
ज्ञानेन्द्र चतुर्वेदी
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