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Tuesday, February 9, 2010

हम हैं क्या अनजान

लोक मंगल की मंगलकामना के साथ भाई सुरेश नीरव को बहुत-बहुत बधाई। हिन्दुस्तान के स्थानीय संपादक की साहित्य पिपासा की चरचा तो सुन रखा था पर आज उनके दोहों से रू-ब-रू हुआ।
प्रताप सोमवंशी के दोहों को पढ़ने के बाद भावविभोर हो गया।
छोटे तुम चिढ़ जाअोगे कह दूंगा बेईमान।
आते हो ससुराल तक हम हैं क्या अनजान।।
दोहे से मैं भी लगाव रखता हूं, इस दोहे को मैं प्रताप जी को पेश करना चाहता हूं।
नयना खारे झील हैं, पुतली बन गई नाव।
पपनी थर-थर कांपती, ज्यों सागर तट गांव।।
अशोक मनोरम

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