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Monday, February 8, 2010

आज की पाती

 मकबूलजी
आपकी ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी। क्या शेर कह रहे हैं आप। सुभान अल्लाह..
तुम्हें देखा, भरी बरसात में, जब शाम को छत पर
सुलगते हैं, तभी से से दिल में ये अंगार क्या कहना।

शकर महंगी, मगर ईमान सस्ता है दुकानों में
यही सब लिख रहे हैं आजकल अखबार क्या कहना।
इन शेरों ने तो कलेजा निकाल दिया। बधाई..
मुनीन्द्र नाथजी
आपकी टिप्पणी बड़ी सार्थक है। वोटों के चक्कर में नेता तरह-तरह के सर्कस कर रहे हैं और जनता को बेबकूफ बना रहे हैं। और यह समझ रहे हैं कि जनता बेवकूफ है। ऐसा उनका चरित्र है। नटवरलाल हैं सब। इन्हें मंहगाई,देश और इंसानियत से कोई वास्ता नहीं है। आज नहीं तो कल जब जनता अपनी पर उतरेगी तो इन्हें सिर छुपाने को कहीं जगह भी नहीं मिलेगी। सटीक टिप्पणी के लिए आपको बधाई।
अरविंद पथिकजी
आप काफी समय से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़े हुए थे। आखिर आपने अपने भ्रष्ट बॉस को भगा ही दियाआपने सिद्ध किया कि सत्यमेव जयते सिर्फ नारा नहीं है बल्कि जिंदगी का संकल्प भी है। आपकी कामयाबी भ्रष्ट व्यवस्था की शिकस्त है। मुबारकां..
भगवान सिंह हंस
आप राशिफल खूब पढ़वा रहे हैं। लगे रहो मुन्ना भाई..।
सभी मित्रों को बधाई..
पं. सुरेश नीरव

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