कल शाम फिल्म ‘अवतार’ देखने सिनेमाघर में था. सामान्यतः फिल्म से पहले ‘जन-गण-मन’ बजता है. परदे पर तिरंगे को लहराता देखना और धून के साथ साथ गाना अच्छा लगता है. मैं प्रतिक्षा कर रहा था कि अमिताभ बच्चन सा’ब मुझसे कुछ कहते नजर आए. ओह! वे कह रहे थे “तुम सीमा पार से आओ तो वापस न जाओ”. अमितजी आपको विनती करने की कोई जरूरत नहीं, आप चाहोगे तब भी आने वाले (घुसपैठिये) जाने से रहे.
परदे पर उभरते दृश्य मुझ में अपराध बोध भर रहे थे. लगा अपराधी हूँ जो सीमा पार से आते प्रेम की अनदेखी कर रहा हूँ, उस प्रेम का स्वागत नहीं कर रहा हूँ. प्रेम उमड़-उमड़ कर आ रहा है, जमीन कम पड़ती है तब सागर के रास्ते आता है और मैं स्वागत नहीं करता. मैं अमितजी से आँखे चुराता हूँ, जी चाहता है मुम्बई पहुँच जाऊँ और कसाब को कस कर गले लगा लूँ. मुझे माफ करना भाई तुम्हारे प्रेम को समझ न सका. तुमसे नफरत करता रहा. आओ अमन की आशा जगाए. इतने भारतीयों का खून कम पड़ा हो तो थोड़ा और बहा लो.
कुछ दिन पहले मैने ट्विट की थी कि जल्द ही “राग-अमन” छिड़ने वाला है. मगर सोच से जल्दी मुम्बई के आँसू सुख गए और अभियान चल निकला.
तीन-चार दिन पहले श्रीमान मणिशंकर अय्यर जी वडोदरा पधारे थे. कोई “राजीव गाँधी” जिला पंचायत फलाना ढिमका का कार्यक्रम था. योजना का नाम राजीव गाँधी इसलिए की लोकतंत्र में राजपरिवार के अलावा किसके नाम पर योजनाएं हो सकती है?
इस कार्यक्रम में श्रीमान मणिशंकर अय्यर जी ने मुख्यमंत्री को राष्ट्रीयता का विरोधी घोषित कर दिया. बड़ी बात नहीं, यह समझ में आता है. मगर मार्के की बात यह कही की मैं पाकिस्तान से प्रेम करता हूँ, तुम भी प्रेम करो, उसे दुश्मन मत मानो. अरे भाई हम तो सारे जहाँ से प्रेम करते है, फिर आप केवल पाकिस्तान को काहे घसीट रहे हो? वो इसलिए घसीट रहें है क्योंकि यहाँ पर मुस्लामों में कॉग्रेस का जनाधार घट रहा है. और वे मुस्लमानों को पाक प्रेमी समझते है. अजीब धर्म-निरपेक्षता है भई. जो पाकिस्तान से प्रेम करते है उन्हे आप फाँसी से अभय दान देते हो और जो मुसलमान भारत से प्रेम करते है उन्हें पाकिस्तान से प्रेम करने को कहते हो. जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता वह आपकी नजरों में राष्ट्रीयता का विरोधी है. अय्यर जी मैं आपको, आपकी नीतियों को, आपके समर्थकों को और आपकी पार्टी को शत-शत नमन करता हूँ.
समझ में नहीं आता ये लोग पाकिस्तान को उसके हाल पर छोड़ क्यों नहीं देते, यह ‘अमन’ के दौरे हर घाव खाने के कुछ दिनों बाद फिर से रह रह कर क्यों पड़ते है?
सौजन्यःहिंदी मीडिया
1 comment:
यह लेख वास्तव में यहाँ लिखा गया था:
http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=1551
जिसे हिन्दी मीडिया ने लेकर छापा, सधन्यवाद.
अतः मेरे इस लेख में सौजन्य : जोगलिखी/संजय बेंगाणी लिखें.
धन्यवाद.
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