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Monday, March 1, 2010

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रुरत क्या है

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रुरत क्या है
हम ख़फा कब थे, मनाने की ज़रुरत क्या है।

आप के दम से तो दुनिया का भरम है क़ायम
आप जब हैं तो ठिकाने की ज़रुरत क्या है।

तेरा कूचा, तेरा दर, तेरी गली है काफी
बे-ठिकानों को ठिकाने की ज़रुरत क्या है।

दिल से मिलने की तमन्ना ही नहीं जब दिल में
हाथ से हाथ मिलाने की ज़रुरत क्या है।

रंग आँखों के लिए, बू है दमागों के लिए
फूल को हाथ लगाने की ज़रुरत क्या है।
शाहिद कबीर
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

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