आज आदरणीय प्रशांत योगीजी का दृष्टांत पढ़कर कई खोए हुए लम्हों का पता अचानक याद आगया। गहना होता है लज्जा स्त्री का। यह पढ़कर मेरे मन में एक विचार कौंधता है कि क्या लज्जा और शर्म सिर्फ स्त्रियों के लिए ही है। क्या पुरुषों को बेशर्म होने का जन्मजात लाइसेंस ईश्वर से मिला हुआ है। ऐसे ही एक बार एक सज्जन ( मैं उन्हें सज्जन ही कहूंगा) गंगा के तट पर नंगे होकर नहा रहे थे। सामने नहाते हुए एक समाज सुधारक सज्जन ने जब यह देखा तो जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि गंगा मैया में नहाने तमाम घरों की बहू-बेटियां भी आई हैं और ये पागल नंगा रहा है। बेशर्म कहीं का। और उन्होंने अपना अंगोछा उतारकर उस पागल को पहना दिया। और खुद नंगे हो गए। पागल ने तब हंसते हुए कहा कि समझदारों को सिर्फ दूसरों का ही नंगापर दिखाई देता है,अपना नहीं। मैं तो पागल हूं इस लिए कपड़े को महत्व को नकारता हूं मगर इन समझदारों को क्या कहें जिनका चिंतन कपड़ों से ही बंधा हुआ है। साधु हुए तो भगवा कपड़े पहन लिए या फिर कोई और चोगा धारण कर लिया। बंधे फिर भी कपड़ों से ही रहे। इनमें कौन महावीर हो सकता है। कौन होसकता है दिगंबर। कौन हो सकता है गजानन महाराज..कौन होसकता है नागा बाबा। दरअसल कपड़ों से वे बंधते हैं जिनके अवचेतन में काम उछल-कूद करता है। जिसे वे दबाकर रखते हैं बड़ी सतर्कता से। मगर वह फिर भी बार-बार निकल आता है। बस्तर की आदिवासी कन्याएं उत्तरीय नहीं पहनती। किसी को कोई परेशानी नहीं होती। सहज-सरल मन है वहां लोगो का। इन्हें कोई कामुकता नहीं सताती। एक बच्चो को कहां ज्ञान होता है कपड़ों का। न अपने का न दूसरों का। वह सिर्फ प्यार की भाषा जानता है। बच्चा निर्मल होता है। उसके मन ही नहीं होता। वह बिल्कुल निर्मन होता है। जहां मन पैदा हुआ वहीं काम,क्रोध और लोभ पैदा होता है। बच्चे के मन नहीं होता इसलिए उसे कोई विकार नहीं होता। सब मन का खेल है। मन ही विकार है। विकार न कभी गंदा होता है न साफ होता है। कपड़ों में,तस्वीरों में,मूर्तियों में यह मन ही है जो वह ढ़ूंढ़ लेता है जो उसके मन में होता है। वह काम की आकृतियां बनाता है छिपकर.लिफ्ट में प्रसाधन कक्ष में। लज्जा-नग्नता सब मन के बनाए फार्मूले हैं। जो मन के पार .चला गया उसके लिए नग्नता और लज्जा अर्थहीन हैं। मगर आदमी का क्या कहें वह तो भगवान को भी कपड़े पहना देता है। भले ही शिव सिर्फ भभूती ही लगाते हों। आदमी रीछ और बंदरों को पूजने को तो तैयार है मगर लंगोट पहनाकर। सोचता हूं उस वक्त मनुष्यता ज्यादा विकसित रही होगी जब उसने खजुराहो की प्रतिमाएं गढ़ीं और वात्सायन पैदा किए होंगे। जिन्होंने मनुष्यता को कामसूत्र का अमूल्य खजाना दिया तोहफे में। कितने निर्मन रहे होंगे वे लोग। जिनकी नैतिकता दर्जियों के सुई धागों की मुहताज नहीं होगी। उन्हें मेरे प्रणाम..
पंडित सुरेश नीरव
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