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Thursday, November 11, 2010

दिल में हुई वेदना को

गर नयन समझ गए होते

न रुकी होती ह्रदय की गति

गर तड़प समझ गए होते

लहू न बनता श्वेत द्रव्य

गर आँसूं बहा लिए होते

खुल जाते बंद नाडियों के द्वार

गर रुदन समझ गए होते

सिसकी उठी थी जब दिल में

गर कान समझ गए होते

बोझिल न हुई होती साँसे

गर टीस समझ गए होते

दिल को छोड़ अकेला यूँ

गर तुम सब नहीं गए होते

मदमस्त हुआ फिरता पगला

गर मर्म समझ गए होते
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