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Wednesday, December 1, 2010

डूबता हूं रोज़ खुंद में तुम तलाशोगे कहां

पंडित सुरेश नीरव की दो ग़ज़लें-
(1)
कोई भी न इस जहां में जान पाया है मुझे
शुक्रिया नगमा जो तूने रोज़ गाया है मुझे

डूबता हूं रोज़ खुंद में तुम तलाशोगे कहां
दिल बेचारा खुद कहां ही ढ़ूंढ़ पाया है मुझे

कितने जंगल कत्ल होंगे इक सड़क के वास्ते
एक  उखड़े  पेड़  ने  बेहद  रुलाया  है  मुझे

आग है पानी के घर में आंसुओं की शक्ल में
इसकी मीठी आंच ने पल-पल जलाया है मुझे

मैं अंधेरों से लड़ा हूं उम्रभर इक शान से
और ये किस्मत की सूरज ने बुझाया है मुझे

उसने कुछ मिट्टी उठाई और हवा में फेंक दी
ज़िंदगी का फलसफा ऐसे बताया है मुझे

लफ्ज कुछ उतरे फलक से और ग़ज़ल में सो गए
कैसी है ये नींद की जिसने जगाया है मुझे।
0000
(2)

दिल से जब भी तुझे याद करता हूं मैं
खुशबुओं के नगर से गुजरता हूं मैं

गुनगुनी सांस की रेशमी आंच में
धूप सुबह की होकर उतरता हूं मैं

नर्म एहसास का खुशनुमा अक्स बन
लफ्ज़ के आईने में संवरता हूं मैं

कांच के जिस्म पर बूंद पारे की बन
टूटता हूं बिखर कर संवरता हूं मैं

चंपई होंठ की पंखुरी पर तिरे
ओस की बूंद बनकर उभरता हूं मैं

क़ह़क़हों की उमड़ती हुई भीड़ में
हो के नीरव हमेशा निखरता हूं मैं।
आई-204,गोविंद पुरम,गाजियाबाद

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