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Monday, January 24, 2011

शत शत नमन

आदरणीय नीरवजी पालागन। मैंने श्रद्धा -प्रसंग में लिखा है। कि श्रद्धा नीरव होती है का मेरी विचारधारा में नीरव वह अभिव्यक्ति है जो निराकार है क्योंकि नी का अर्थ- निः और रव का अर्थ- आवाज अर्थात जिसमें कोई आवाज न हो, वही निःशब्द है और जो निःशब्द है वह है ही निराकार है तो फिर मुझ जैसा अल्प बुद्धि उस परमपिता परमेश्वर तक कैसे पहुँच सकता है, बड़ा दुर्लभ है। फिर वहाँ केवल गुरु की शरण ही दिखाई देती है। इसलिए मैं गुरु की मंगलरुपी चरणरज का ही अनुष्ठान करता हूँ। मैं अपने को बड़ा धन्य समझता हूँ, बड़ा भाग्यशाली समझता हूँ और गर्व महसूस करता हूँ कि पंडित सुरेश नीरवजी की शरण में मैं श्रद्धानवत हुआ। उन्होंने मुझे अपनी चरणरज का स्पर्श दिया। पोथी पढ़ने या लिखने से ज्ञान मिल सकता है परन्तु संज्ञान की पराकाष्ठा की परिधि में नहीं पहुँच सकता है। कबीर की वाणी का सत्यार्थ प्रकाश ज्योतित है कि पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोई। फिर वहाँ केवल गुरु की शरण ही शेष रह जाती है। और इससे बड़ा कोई तीर्थ नहीं है। भरत में एक भाव की संलग्नता थी उस गुरु के प्रति। इसलिए उसने इन भौतिक द्रष्टिव्य चीजों का परित्याग कर दिया और केवल गुरु की शरण का ही अनुगमन/अनुपालन किया। क्योंकि भरतजी ये जानते थे कि उससे बड़ा कोई दर्शन नहीं है। उस परमपिता परमेश्वर तक पहुँचने का वही केवल आलंबन है। और गुरु स्वयं नीरव हो तो फिर बात ही क्या है। क्योंकि गुरु का मेरे अन्तः वास है। अहम् गुरुस्यशरणम गच्छामि। पालागन।
भगवान सिंह हंस














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