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Wednesday, February 9, 2011

पैसा हराम का


कहीं फँस गया होगा
आ रहा होगा
मिटा जाम!
हर जगह लगा है
किसी की प्यास,
किसी की भूख
सब चाह में खो गईं
मिटे जाम!
तू कितना बेदर्द है, बेरहम है
तेरी बेशर्मी की भी हद है
तुझे लज्जा नहीं आती
तू बड़ा अमानवीयता से लगा है
तू किसका सगा है
किसीका प्यार
इन पाँखुरियों में फँसा है
जो उड़ नहीं सकता
किस-किस को गिनाऊँ
किसी का सौहर होगा
किसी का बेटा होगा
माँ की ममता की प्यास
लाडला आ रहा होगा
बार-बार दर तक जाती
फिर अन्दर आती
काहे के फ्लाईओवर
काहे की सडकें
जाम ही जाम
सुबह हो या शाम
किससे कहें
कान पर जूं तक नहीं रेंगती
मिटे डकार जाते हैं
व्यवस्था के नाम पर
साँप नहीं, अजगर हैं
साबुत निगलते हैं
पकड़ा-धकड़ी का
ड्रामा करते हैं
उनकी छवि बिगडती नहीं
और बनती है
कुर्ता बदलते हैं
बदनाम का
उन्हें पैसा मिलता है
हराम का।
भगवान सिंह हंस-9013456949









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