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Thursday, June 9, 2011

मिल जाए अगर तुझसे मिलने का इक बहाना

मित्रो, ये ग़ज़ल कुछ दिन पहले ब्लॉग पे पोस्ट की थी। ग़ज़ल में कुछ खामियां थीं,
जिन्हें दूर कर के ग़ज़ल दोबारा पेश है।
मिल जाए अगर तुझसे मिलने का इक बहाना
बनती है तो बन जाए मेरी ज़िन्दगी फ़साना।

हमने तुम्हारे दर तक फेरा लगा दिया है
भूलें न आप भी अब मेरी गली में आना।

दिखला के इक झलक सी परदे में छुप गए हो
अब शाम ढल रही है छोड़ो भी यूँ सताना।

ग़ज़लों की इस कहन में मंज़रकशी हमारी
तुमने तो देखली है देखेगा अब ज़माना।

अब रात हो रही है सब बेक़रार होंगे
छोड़ो भी ऐसी बातें छोड़ो भी ये बहाना।

फिर बिजलियाँ गिरेंगी दिल पर हमारे देखो
तुम बिजलियाँ गिरा कर ऐसे न मुस्कराना।

मक़बूल कह रहे हैं पहले तो जाम भरिये
फिर मूड आ गया तो छेड़ेंगे हम तराना।
मृगेन्द्र मक़बूल
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