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Friday, July 1, 2011

बड़े प्यार से मिलना सबसे दुनिया में इंसान रे


  हास्य-व्यंग्य-
सम्मान की ठरक
पंडित सुरेश नीरव
सम्मान की ठरक एक ऐसी सनातन ठरक है जिससे आदमी कभी मुक्त नहीं हो पाता है।  उसे जिंदा रहते तो क्या मरणोपरांत भी सम्मान की ललक बनी रहती है। और इसे पाने के लिए  न्नहा-सा आदमी नाना प्रकार के जुगाड़ करता है। वह हर क्षण-हर पल यही सूंघता रहता है कि उसे सम्मान कहां-कहां से और कैसे-कैसे मिल सकता है। बड़े प्यार से मिलना सबसे दुनिया में इंसान रे न जाने किस जुगाड़ के जरिए मिल जाए सम्मान रे। इसी मंत्र को जपते-जपते जब हमारे श्रीयुत खबीस घुसुरभेदीजी के शरीर के टायर बुरी तरह रिटायर होने लगे तो उन्होंने भी इसी लालसा में अपने भूमिगत प्रयासों के जरिए एक साहित्यिक संस्था की अध्यक्षता हथिया ली। जोड़तोड़ के लिए प्रतिबद्ध,चमचागीरी के लिए वचनबद्ध और षडयंत्रों से संबद्ध खबीस घुसुरभेदीजी अध्यक्ष बनते ही अब अपने आप को अदब की सियासत का मुगलेआजम समझने लगे हैं। यानी खुद अकबर और उनके चमचे नवरत्न। वे जिसे चाहते हैं उससे कुछ अल्प राशि का निवेश कराके सम्मानित कर देते हैं। पहले आओ पहले सम्मान पाओं। लेकिन भेंट अपरिहार्यरूप से चढाओ। बेईमानी के प्रति दुर्दांत निष्ठा और कुटिल बौद्धिकता का खबीस घुसुरभेदीजी बड़ा ही असरकारी और  चमत्कारी कामयाब नमूना हैं। अपनी इस अटूट और अखंड पारदर्शी बेशर्मी के बूते उन्होंने साहित्यिक समाज में वो सम्मानजनके हैसियत हासिल कर ली है जो कि अंडरवर्ड में दाउद की और शरीफ नेताओं में नारायणदत्त लिवारी की है। हिंदी और अंग्रेजी में उनकी विद्वता की स्थिति बराबरी पर ही छूटती है. अर्थात हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं के साहित्यकार एकमत से निर्विरोध उन्हें एक आदमकद टिटपुंजिया जुगाड़ू ही मानते हैं। उनके बोलने का अंदाज कुछ-कुछ उस मजमेबाज मंजनफरोश से मिलता-जुलता है जो फुटपाथ पर चादर बिछाकर कुछ बाजारू जुमलों की दम पर अपना मंजन बेच लेता है। कुछ ऐसी ही शैली में खबीस घुसुरभेदीजी अपनी व्यक्तिगत प्रशंसा सार्वजनिकरूप से करते पाए जाते हैं। और मजमें में मौजूद निकृष्ठता में उत्कृष्ठ उनके जमूरे बोर और विभोर होकर उछल-उछल कर तालियां बजाते हैं। खबीस घुसुरभेदीजी की संस्था साहित्य में कबाड़ के कुटीर उद्योग का ललित उदाहरण है। ठीक वैसे ही जैसे कि एक चुंबक की तरफ लोहे के कण अपने आप खिंचे चले आते हैं। वैसे ही खबीस घुसुरभेदीजी के पास भी साहित्य के फुस्स पटाखे अपने आप खिंचे चले आते हैं। फुस्स पटाखों के ठुस्स और ठस्स कप्तान हैं हमारे खबीस घुसुरभेदीजी। साहित्य के एंटी पारस। जैसे पारसमणि के स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है ठीक इसके विलोंम खबीस घुसुरभेदीजी के संपर्क में सोना भी आकर शर्तीया लोहा बन जाता है। खबीस घुसुरभेदीजी की इस प्रतिभा का तो  उनके विरोधी भी लोहा मानते हैं। इनकी तुकबंदियों में अनुपम आतंकी हाहाकार है। लोलुप क्षणों की गरमागरम फुफकार है। और बिना किसी विषय के  एकता कपूर के सीरियलों की तरह धारा प्रवाह बोलते रहने का चमत्कार है। और ये ठसक खबीस घुसुरभेदीजी के कब्रगामी तन-मन मे आज भी बाकायदा बरकरार है। जब ये बोलते हैं तो शब्द इनके ओठों के ट्रेड टावर से कूद-कूदकर आत्महत्याएं करते हैं। अलंकार और छंद नमस्कार की मुद्रा में किसी बंधुआ मजदूर की तरह इनके आगे पानी भरते हैं।  कई सालों से पूरे जोश के साथ साल में एक बार खबीस घुसुरभेदीजी अपने चमचों का एक राष्ट्रीय पशुमेला आयोजित करते हैं। हर साल की तरह फिर सालाना पशुमेला करने पर वो आमादा हैं। इस फितूर में उन्होंने पांच किलो सम्मान पत्र छपवा डाले हैं। सम्मान लोलुप और पुरस्कारखोर तुक्कड़ों के शेयर बाजार में उनकी खुशामद का सैंसेक्स आजकल मंहगाई की तरह बढ़ा हुआ है। भाइयो-बहनो अगर आपको भी सम्मानित होने की खुजली मची हो तो खबीस घुसुरभेदीजी से तुरंत संपर्क करें और फौरन सम्मान पाएं। और हां, सीधा अध्यक्षजी से ही संपर्क करें किसी दलाल को साथ न लाएं। हताश पुरस्कार रोगी निराश न हों। पता जानने के लिए हमारी फोकटिया सेवा का तत्काल लाभ उठाएं। गारटेंड फायदा होगा। एक बार मिल तो लें। हमारी शुभकामनाएं।
आई-204,गोविंदपुरम,गाजियाबाद-201001
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