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Monday, July 18, 2011

मैं नदी हूँ

मैं नदी हूँ
पीर हूँ हिमखण्ड की

जब सह न पाया ताप वह
दिनमान की पहली किरण का
गलने लगा
बहने लगा-वह धार बनकर नीर की
बहती हुई उस पीर का
पर्यायवाची नाम मेरा धर दिया
कह दिया
कि मैं नदी हूँ।

मैं, छोड़ पीहर जब चली थी
पारदर्शी रूप था
धूप जैसा रंग था
पर धरा के वासियों ने क्या किया
गन्दगी के ढेर से
हर अंग मेरा ढक दिया

चांदनी सा रूप मेरा
बादलों सा धूसर कर दिया

क्या करूँ
बेहद दुखी हूँ
क्या कहूँगी मैं समंदर से
जो बड़ा बेताब है मेरे मिलन को
कैसे कहूँगी
प्रिय ! तुम मुझे स्वीकार कर लो
मैं कुंरूपा हूँ नहीं, कर दी गई हूँ
नहीं ये दोष मेरा
दोनों तटों को आज मेरे
आदमी का रूप धर कर
वनचरों ने आन घेरा
लाज उनको है नहीं छूकर गई
पूरी तरह विद्रूप करके, वे मुझे
कर रहे हैं गर्व से
कि मैं नदी हूँ
- बी एल गौड़
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