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Thursday, September 8, 2011

रिश्वत की सूंघनी


हास्य-व्यंग्य-
 कायराना हरकत की ताज़ा किश्त
पंडित सुरेश नीरव
रिश्वत की सूंघनी सूंघ-सूंघकर ऊंघते हुए पुलिस महकमें का ह्यूमन स्टाफ और विभागीय कुत्ते दोनों ही समानरुप से सक्रिय हो गए। मीडिया और सियासी समाज में वैसी ही हलचल शुरू हो गई जैसी कि दीवाली से पहले पटाखों के कारोबारियों या हलवाइयों में शुरू हो जाती है। खबर है कि आतंकवादियों ने सरेआम दिन-दहाड़े बम ब्लास्ट कर ग्यारह लोगों को मार गिराया और सत्तर लोगों को घायल कर दिया। सरकार ने इसे फिर एक बार दहशतगर्दों की कायराना हरकत बताकर अपने स्वाभिमान का परिचय दे दिया है। उधर आतंकी भी गहरे सदमें में हैं कि हमारी हर गतिविधि को सरकार कायराना बताकर हमें हतोतस्हित क्यों करती रहती है। कितनी किश्तें और चुरानी पड़ेंगी। ऐसा अब और क्या करें कि सरकार के मुंह से दो शब्द तारीफ के हम भी सुन सकें। संसद पर हमला,विमान अपहरण और मुंबई के रोमांचक करतब... कितनें तो आयटम पेश कर चुके हैं हमलोग मगर वही होता है कि मुर्गी अपने जान से गई और राजा को मज़ा ही नहीं आता। अब और क्या करें। क्या बहादुरी दिखाने को एटमबम ही पटक दें। बुद्धिजीवियों को भी देखो उन्हें हमारी हर परफोरमेंस टिटपुंजिया ही नजर आती है। कभी तारीफ नहीं करते हमारी। कैसे हटेगा इंडिया से भ्रष्टाचार। लीजिए,  जहन प्रसाद दिमागीजी को चैनल के दफ्तर से फोन आ गया है। वे अपने वारड्रोब से मनपसंद कपड़े छांटकर पूरी सज-धज के साथ इस बचकानी हरकत की निंदा करने अपनी ब्यूटी और ड्यूटी के मुताबिक टीवी चैनल के दफ्तर को सिधार गए हैं। समाज में निंदाविषेषज्ञों की एक अलग ही नस्ल होती है। जब भी मौका मिलता है,वे निंदा करने तड़ से टीवी दफ्तर उसी उत्साह से भागते हैं जिस उत्साह से डायरिया का मरीज़ सार्वजनिक सुविधा केन्द्र में अपनी नितांत गुप्तरंग अभिव्यक्ति के लिए दौड़-दौड़कर जाता है। आतंकवादी गंदी हरकत करें इसका मतलब ये तो नहीं कि मंत्रीजी गंदे कपड़ों में ही निकल पड़ें। दो सूट सिलवाए थे मंत्रीजी ने। कोई मुबारक मौका आ ही नहीं रहा था इन्हें पहनने का। एक अभी पहन लेते हैं। घटनास्थल जाने के लिए। दूसरा वहां से लौटकर प्रेस-कांफ्रेस के वक्त पहन लेंगे। मंत्रीजी ने मन-ही-मन मन बनाया। सूट पहना। विदेशी पर्फ्यूम की फुहारों में भीगे और इस हाहाकारी पर्यटन के लिए बहादुरीपूर्वक रवाना हो गए। वहां जाकर उन्हें नियमानुसार दहशतगर्दों की इस कायराना हरकत की निंदा और सरकारी सुरक्षा व्यवस्था के चाकचौबंद इंतजामों की ईमानदारी से तारीफ करनी है। सरकार का काम होता ही बड़ा बारीक है। तारीफ और प्रशंसा फिफ्टी-फिफ्टी। प्रतिपक्ष को तो सिर्फ निंदा ही करनी होती है। आतंकवादियों की भी और सरकार की भी। भले ही जब सरकार में  ये खुद हों तो उन्हें हवाई जहाज से कांधार तक छोड़ने जाएं। आजकल हम सरकार हैं। गलती से भी कहीं व्यवस्था की निंदा और आतंकियों के लिए कोई ऐसी-वैसी बात निकल गई तो जग हंसाई के साथ-साथ मीडिया हंसाई भी हो जाएगी। मंत्रीजी मन-ही-मन अपने डॉयलाग रटते हुए अपने पूरे तामझाम के साथ घटना स्थल की ओर रवाना हो चुके हैं। उन्होंने पता करवाया है कि पुलिस और पत्रकार वहां  अभी तक पहुंचे हैं कि नहीं। उधर किनारे खड़ा एक आम आदमी यह सोच-सोचकर अपना भेजा फ्राई कर रहा है कि आतंकवादी जब-जब कायराना हरकत करते हैं तब-तब हमारे जनसेवकों के कमांडो की संख्या उतनी ही बहादुरी के साथ अपने आप कैसे बढ़ जाती है। विशेषाधिकार हनन के डर से वह सिर्फ बुदबुदाता है,बोलता नहीं है। क्यों कि वह महज़ एक आम आदमी है। आम आदमी बने रहने में ही उसकी इज्जत है। उसे बाबा रामदेव नहीं बनना।
आई-204,गोविंदपुरम,गाज़ियाबाद.201013
मोबाइल-09810243966
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