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Friday, September 16, 2011

राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की मांग

अन्ना हजारे मूल बातें कहते हैं, इसलिए बड़े-बड़े विद्वान उनसे बहस नहीं कर सकते. सांसद सेवक हैं और देश की जनता मालिक है. अगर सेवक मालिक की बात न माने तो मालिक को यह हक़ है कि वह उसे बाहर कर दे. यही दलील अन्ना हजारे की है. देश को भ्रष्ट सांसदों से छुटकारा दिलाने के लिए राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की मांग लेकर अन्ना हजारे और उनकी टीम आंदोलन करने वाली है. सांसदों को समय से पहले ब़र्खास्त और चुनाव में उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार के लिए अन्ना हजारे आंदोलन करने वाले हैं. सरकार भी इन मांगों को लेकर चिंतित है. आने वाले समय में यह विषय सबसे बड़ा बहस का मुद्दा बनकर उभरेगा. सारे मंत्री, नेता और चुनाव आयोग के पुराने और वर्तमान अधिकारी इन दोनों मांगों को सिरे से नकार रहे हैं. आश्चर्य तो तब होता है, जब जेपी आंदोलन से निकले नेता आज जेपी की मांगों को ही नकारते हैं. चुनाव आयोग के पूर्व आयुक्त राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट को लागू करने में कई परेशानियों का वास्ता देते हैं. राहुल गांधी ने सरकारी खर्च पर चुनाव कराने की बात कही. सुझाव ग़लत नहीं है, लेकिन शर्त यही है कि पूरा खर्च सरकार वहन करे. आज देश में चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं. चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार संविधान ने दिया है, लेकिन राजनीतिक दलों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि ग़रीब और ईमानदार व्यक्ति चुनाव लड़ ही नहीं सकता. ऐसा करके राजनीतिक दलों ने देश के करोड़ों लोगों के प्रजातांत्रिक और मौलिक अधिकारों का हनन किया है.
ऐसा क्यों होता है कि सरकार जितनी भी योजनाएं बनाती है, उनका फायदा स़िर्फ 5 फीसदी लोगों को मिलता है. यह कैसा प्रजातंत्र है, जिसमें ग़रीब किसानों की ज़मीनें छीनकर बड़े-बड़े भूमाफियाओं और बिल्डरों को करोड़ों रुपये कमाने दिया जाता है. यह कौन सी लोकतांत्रिक मर्यादा है, जिसमें सरकार उद्योगपतियों को करों में छूट दे देती है और ग़रीब किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में कटौती कर देती है. यह कैसा जनतंत्र है, जहां का आम नागरिक ज़िंदगी जीने के लिए ज़द्दोजहद कर रहा है और शहरों में रहने वाले चंद लोग विकास की रोशनी में जगमगा रहे हैं. यह कैसा लोकतंत्र है, जहां सांसद और विधायक जनता के प्रति ज़िम्मेदार न होकर पार्टी के प्रति व़फादारी को ही अपना राजनीतिक कर्तव्य मानते हैं. लोकतंत्र के रहनुमाओं को यह कैसा घमंड है कि जनता सड़कों पर है, लेकिन वे बातें किसी तानाशाह की तरह करते हैं. देश में एक नई स्थिति पैदा हुई है. एक आशा जगी है. अगर प्रजातंत्र में लोगों का विश्वास बनाए रखना है तो राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट क़ानून बनाना होगा. साथ ही विधायिका में व्हिप और चुनावों में निजी धन के इस्तेमाल को पूरी तरह खत्म करना होगा.
चुनाव आयोग के एक दस्तावेज में एक अनोखी बात लिखी है. नागरिकों को क्यों वोट देना चाहिए, इस सवाल के जवाब में चुनाव आयोग कहता है कि प्रजातंत्र में वोट देने का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है. इसके इस्तेमाल से नागरिक देश की तक़दीर लिखते हैं. वे अपने नुमाइंदे चुनते हैं, जो सरकार चलाते हैं और सभी देशवासियों के विकास के लिए और उनके हित में फैसले लेते हैं. चुनाव आयोग की बातें तो सही हैं, लेकिन यह पूरा सच नहीं है. सही इसलिए हैं, क्योंकि संविधान लिखने वालों ने तो यही सोचकर लिखा था. स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले महापुरुषों ने भी यही सपना देखा था, लेकिन एक तीखा सत्य भी है, जिसे आज की पीढ़ी को समझना जरूरी है. अगर हम नहीं समझ सके तो संभलने का मौका नहीं मिलेगा. देश में तबाही और तानाशाही का राज लौट आएगा. देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था की सच्चाई यह है कि हमारा लोकतंत्र कुछ परिवारों और चंद नेताओं के क्लब की जागीर बन गया है. ऐसे में जब अन्ना यह ऐलान करते हैं कि उनका अगला आंदोलन राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट के लिए होगा, तो राजनीतिक भूकंप आना निश्चित है. समझने वाली बात यह है कि प्रजातंत्र पर राजनीतिक दलों का ऐसा शिकंजा है, उनका ऐसा मैनेजमेंट है कि नागरिकों को ये दोनों अधिकार मिलने के बावजूद प्रजातंत्र उनके चंगुल से बाहर नहीं निकल पाएगा.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर चुना हुआ जनप्रतिनिधि अक्षम, निकम्मा, भ्रष्ट और बेईमान निकल जाए, राजनीतिक दल के कैडरों या धनबल या बाहुबल की वजह से चुनाव जीत जाए तो ऐसे व्यक्ति को पांच साल तक झेलना क्या प्रजातंत्र कहलाएगा. फर्ज़ कीजिए, कोई सांसद भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ा जाता है या फिर किसी मर्डर केस में उसे जेल जाना पड़ता है तो ऐसे सांसद का क्या करना चाहिए. संसद अगर प्रजातंत्र का मंदिर है तो इस मंदिर में ऐसे लोगों को कैसे बैठने दिया जा सकता है. दूसरा सवाल यह है कि अगर सांसद किसी अपराध में जेल चला जाता है तो उसके संसदीय क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा. यह सवाल इसलिए उठता है, क्योंकि सुरेश कलमाड़ी को कोर्ट ने संसद में जाने से मना कर दिया. ए राजा भी जेल में हैं. वह भी संसद की प्रक्रिया से बाहर हैं. इसका मतलब यह है कि कलमाड़ी और ए राजा के संसदीय क्षेत्र के लोग बिना किसी प्रतिनिधि के हैं. क्या यह पुणे और नीलगिरि के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है. क्या प्रजातंत्र में मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है. इस सवाल का जवाब राजनीतिक दलों को देना चाहिए. जो लोग राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट का विरोध कर रहे हैं, उनकी दलील यह है कि इसके कार्यान्वयन में का़फी कठिनाइयां हैं. चुनाव आयोग को का़फी मुश्किल होगी. तो सवाल यह है कि चुनाव आयोग या सरकार की मुश्किलें महत्वपूर्ण हैं या संविधान के मूल तत्व. क्या हमने इसे लागू करके देख लिया?
अगर यही दलील है तो देश की उन सारी योजनाओं को भी बंद कर देना चाहिए, जो ठीक से लागू नहीं हो पातीं या फिर सरकार की मुश्किलों की वजह से विफल हो जाती हैं. वोट देने का अधिकार मौलिक अधिकार है. इसे कोई नहीं छीन सकता है. वोट देने का मतलब क्या होता है. प्रजातंत्र का मतलब ऐसी सरकार से है, जो जनता के लिए काम करती है और जो जनता द्वारा चुनी जाती है. भारत में भी पांच सालों के लिए सांसदों और विधायकों को चुना जाता है. क्या यह मान लेना चाहिए कि एक बार चुनाव जीत जाने के बाद पांच साल तक मनमानी करने का अधिकार मिल जाता है. अगर नहीं तो जनप्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार किसके पास हो? राजनीतिक दलों ने अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए प्रजातंत्र को ही उल्टा टांग दिया है. भारत के प्रजातंत्र में एक अनोखा विरोधाभास है. संविधान में तो यह कहा गया है कि सांसद और विधायक जनता के प्रतिनिधि हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने क़ानून में इस तरह फेरबदल कर दिया है कि सांसद या विधायक को जनता के प्रतिनिधि के बजाय पार्टी का एक प्यादा बना दिया गया. फर्ज़ कीजिए, कोई क़ानून बनता है, जिससे किसी सांसद या विधायक के क्षेत्र के लोगों पर विपरीत असर पड़ेगा. उसके क्षेत्र के सारे लोग उस क़ानून का विरोध कर रहे हैं, लेकिन उस सांसद या विधायक की पार्टी उस क़ानून के पक्ष में है. जब वोटिंग होगी तो उसके सामने दो विकल्प होंगे, या तो वह जनता की आवाज़ सुने या फिर पार्टी की बात माने. अगर वह पार्टी की बात मानता है तो उसे इसका हिसाब अगले चुनाव में चुकाना होगा और अगर वह जनता की आवाज सुनता है और क़ानून के विरोध में वोट करता है तो उसकी सदस्यता ही खत्म हो जाएगी. यही है हमारे देश की संसदीय व्यवस्था का चरित्र. अब सवाल यह है कि ऐसे जनप्रतिनिधियों का प्रजातंत्र में क्या औचित्य है, जिनके लिए जनता की आवाज को अनसुना करना एक मजबूरी बन जाती है.
जबसे सरकार ने नव उदारवाद की नीति अपनाई है, तबसे स्थिति और भी खराब हो गई है. भ्रष्टाचार में इज़ा़फा हुआ, चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गया. यही वजह है कि चुनाव में पैसे का महत्व बढ़ गया है. ऐसे उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद अपनी सारी ऊर्जा पैसा कमाने में लगा देते हैं. उनका मक़सद स़िर्फ पैसा कमाना होता है, न कि समाज सेवा.
इस बात का श्रेय नीतीश कुमार को देना ही चाहिए कि उन्होंने बिहार में लोगों को नगर पार्षदों को वापस बुलाने का अधिकार देने का फैसला किया. इस अधिकार से लाभ यह होगा कि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह बनेंगे. इस अधिकार से जनता भी सजग रहेगी और वह समाज की समस्याओं और जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों पर नज़र रखेगी. इससे समाज का राजनीतिक सशक्तिकरण होगा. देश के हर इलाके में गरीबों, पिछड़ों और शोषितों की संख्या ज्यादा है, इसलिए जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने में उनकी सबसे ज्यादा भागीदारी होगी. अब यह तय है कि जनप्रतिनिधि इन वर्गों की समस्याओं के प्रति उदासीन रहने का खतरा नहीं उठाएंगे. इस अधिकार के बाद ही लोकतंत्र को सही मायने में जनता का राज कहा जा सकता है.
आज जो स्थिति है, उसमें यही कहा जा सकता है कि लोकतंत्र राजनीतिक दलों के हाथ की कठपुतली बन गया है. सत्ता पक्ष अपनी मनमर्जी से सरकारी तंत्र का जैसा इस्तेमाल करना चाहता है, कर लेता है. जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार देश की जनता को सशक्त करेगा. सांसदों-विधायकों को जनता के गुस्से का डर भी बना रहेगा, लेकिन इससे समस्या नहीं सुलझने वाली है, क्योंकि उनकी जगह जो भी चुनकर जाएगा, वह वही करेगा, जो पिछले जनप्रतिनिधि ने किया. इस बीमारी की असली वजह यह है कि देश में जनप्रतिनिधि जनता द्वारा चुने तो जाते हैं, लेकिन विधायिका में वे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि की तरह काम करते हैं. यह उनकी आदत नहीं, विधायिका के सदस्य बने रहने की शर्त है.
जब चुनाव होते हैं तो हर उम्मीदवार कुछ वायदे करता है. जब वह चुन लिया जाता है तो अपने वायदे के मुताबिक़ काम नहीं कर पाता है. विश्व के अधिकांश प्रजातंत्रों में जनप्रतिनिधि अपने वायदे को पूरा करने में लगे रहते हैं. अगर कोई योजना उसे ग़लत लगती है तो वह अपनी पार्टी के खिला़फ भी वोट कर सकता है, अपने विचार रख सकता है. लेकिन हिंदुस्तान में जनप्रतिनिधियों को संसद में अपनी पार्टी की व्हिप के मुताबिक़ चलना पड़ता है. किसी सांसद का किस विषय पर क्या पक्ष होगा, यह तय करने का अधिकार उसे नहीं है. उसे पार्टी के मुताबिक ही चलना पड़ता है, वरना उसे निष्कासित कर दिया जाता है. वैसे मज़ेदार बात यह है कि व्हिप का मतलब भी चाबुक होता है. पार्टी चाबुक से अपने सदस्यों को हांकती है. यह जनप्रतिनिधि और जनता के प्रजातांत्रिक अधिकारों का घोर हनन है. यह लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अपमान है. यह प्रचलन दलबदल क़ानून लागू होने से शुरू हुआ. देश में आयाराम-गयाराम की राजनीति पर अंकुश लगाने के लिए 1985 में दलबदल निरोधक क़ानून लागू किया गया था. सत्ता में भागीदारी या दूसरे लाभ हासिल करने के चक्कर में अपनी पार्टी को छलने की नेताओं की आदत पर अंकुश लगाने के लिए यह क़ानून अमल में लाया गया था.
अ़फसोस तो इस बात का है कि देश की सभी पार्टियां अपने संगठन के संचालन में लोकतांत्रिक नहीं हैं. हिंदुस्तान में किसी भी पार्टी में वोटिंग के ज़रिए फैसला लेने का प्रचलन नहीं है. कार्यकर्ताओं की बात तो दूर, सांसदों और विधायकों की भी किसी पार्टी में कोई सुनवाई नहीं है. हर पार्टी के शीर्ष पर एक ग्रुप बैठा है. देश की ज़्यादातर पार्टियां पारिवारिक पार्टियां हैं, इसलिए फैसला लेने का अधिकार पार्टी चलाने वाले परिवार तक सीमित है. भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियों और जेडीयू आदि में परिवारवाद तो नहीं है, लेकिन वहां भी फैसला लेने का हक़ कुछ लोगों तक सीमित है. राजनीतिक दल अगर वोटिंग करके सांसदों और विधायकों को निर्देश देते तो भी कुछ कहा जा सकता था, लेकिन यहां तो एक परिवार की राय ही पार्टी की राय बन जाती है और अगर उसी पार्टी की सरकार हो तो एक परिवार की राय सरकार की राय बन जाती है. क़डवा सच तो यह है कि भारत में राजनीतिक पार्टियां अलोकतांत्रिक हैं और वे किसी परिवार या कुछ खास लोगों या समूहों की गिरफ्त में फंसकर सामंतवादी हो गई हैं. भारत का प्रजातंत्र एक अजीब तरह के सामंतवाद के जाल में फंस गया है. संविधान बनाने वाले महापुरुषों ने शायद यह कल्पना भी नहीं की होगी कि भारत में प्रजातंत्र की ऐसी दुर्दशा हो जाएगी, वरना वे बचाव के लिए संविधान में कोई प्रावधान ज़रूर करते. यह एक नई स्थिति पैदा हुई है, इसलिए इसका इलाज भी ज़रूरी है. अगर सांसदों को वापस बुलाए जाने का डर रहेगा तो वे दलबदल करने से बचेंगे. इसलिए आज ज़रूरत इस बात की है कि राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट के साथ-साथ संसद और विधानसभाओं में चीफ व्हिप को खत्म किया जाए, ताकि देश के प्रजातंत्र को परिपक्व होने का मौका मिल सके. जब तक संसद और विधानसभाओं में व्हिप को नहीं हटाया जाएगा और जब तक राजनीतिक दलों में आंतरिक प्रजातंत्र नहीं होगा, तब तक देश का प्रजातंत्र चंद लोगों की जागीर बना रहेगा.
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गर्व तो हर भारतीय को है, लेकिन जब संसद के सदस्यों की असलियत का पता चलता है तो अ़फसोस होता है. सामान्य चुनावी प्रक्रिया अपराधियों और अयोग्य लोगों को चुनाव में हिस्सा लेने से रोक नहीं सकी. जबसे नव उदारवाद की नीति सरकार ने अपनाई है, तबसे स्थिति और भी खराब हो गई है. भ्रष्टाचार में इज़ा़फा हुआ, चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गया. यही वजह है कि चुनाव में पैसे का महत्व बढ़ गया है. ऐसे उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद अपनी सारी ऊर्जा पैसा कमाने में लगा देते हैं. उनका मक़सद पैसा कमाना होता है, न कि समाज सेवा. प्रजातांत्रिक संस्थाओं को 60 साल का व़क्त मिला कि वे स्वयं को मर्यादित कर सकें, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. अब व़क्त आ गया है कि देश में बड़े पैमाने पर राजनीतिक और चुनाव सुधार की ज़रूरत है. इससे पहले कि देश की जनता वर्तमान व्यवस्था से पूरी तरह भ्रमित हो जाए, उसका विश्वास खत्म हो जाए, सभी प्रजातांत्रिक संस्थाओं, उनके सदस्यों एवं अधिकारियों को ज़िम्मेदार और जवाबदेह बनना होगा.

RIGHT TO RECALL & RIGHT TO REJECT : जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने और खारिज करने का मतलब क्‍या है

राइट टू रिकॉल का मतलब है सांसदों और विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार और राइट टू रिजेक्ट का मतलब है कि चुनाव में उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार. इसे समझना ज़रूरी है. सांसदों और विधायकों को वापस बुलाने के अधिकार को ऐसे समझा जा सकता है कि अगर किसी भी इलाके के लोगों को लगता है कि उनका सांसद या विधायक अपना दायित्व नहीं निभा पा रहा है या फिर वह भ्रष्टाचार में लिप्त है या फिर लोगों को लगता है कि जिन मुद्दों पर उसने वोट लिया, वह वे काम नहीं कर रहा है तो जनता को यह अधिकार है कि वह अपने सांसद या विधायक को वापस बुला ले. यह अधिकार चुने हुए सांसदों और विधायकों के खिला़फ इस्तेमाल किया जा सकता है. राइट टू रिजेक्ट इससे थोड़ा अलग है. इस अधिकार का इस्तेमाल मतदाता चुनाव के दौरान ही कर सकते हैं. अगर किसी भी क्षेत्र के लोगों को लगता है कि सारे ही उम्मीदवार भ्रष्ट या अयोग्य हैं तो वे इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं. हर ईवीएम में एक ऐसा बटन होगा, जिससे मतदाता सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट कर सकता है. सवाल यह है कि क्या भारत में ऐसा संभव है, क्या क़ानून में इस तरह का प्रावधान है. अगर वापस बुलाया भी जाए तो उसकी प्रक्रिया क्या हो, चुनाव में सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने की प्रक्रिया क्या हो. ऐसी कई सारी बातें हैं, जिनके बारे में जानना और समझना ज़रूरी है.
जनप्रतिनिधियों को ब़र्खास्त करने की प्रथा प्राचीन है. सबसे पहले यूनान में इस प्रथा की शुरुआत हुई. आधुनिक काल में यह पहली बार स्विट्जरलैंड में शुरू हुई. दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जहां नागरिकों को जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार प्राप्त है. अमेरिका के कई राज्यों में ऐसी व्यवस्था है. भारत में लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने सबसे पहले राइट टू रिकॉल की मांग की थी. 4 नवंबर, 1974 को संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान सांसदों को वापस बुलाने का आह्वान किया गया था. इसके बाद जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार केवल एक विषय के रूप में सेमिनारों और गोष्ठियों तक ही सीमित रहा. राजनीतिक दलों ने तो इस मुद्दे को ही दबा दिया.
चौथी दुनिया से
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