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Thursday, November 17, 2011

झोर-ग़ज़ल और महाकाव्य


बड़ियां लगातीं महिलाएं
परंपरा-
आलू-बड़ी कौ
झोर
घर में शादी का उत्सव हो तो गीत और नृत्य के खजाने अपने-आप खुल जाते हैं। महिलाएं इकट्ठी होकर कोई भी काम करती हैं तो मंगल गान के साथ। शुरूआत होती है बड़ी लगाने से। महिलाएं इकट्ठी होकर पहले दाल पीसती हैं और फिर पिसी हुई दाल की बड़ियां बनाती हैं। और फिर बनता है बड़ी-आलूओं का झोर। झोर चौबों में कढ़ी को कहते हैं। और बिना झोर के कोई उत्सव चौबों का पूरा नहीं होता है। तो साहब पंडित सुरेश नीरव के घर में बड़ियां बना दी गई हैं। यानी मंगल उत्सव के प्रथम सोपान पर पहुंच गया है उल्लास। संदर्भ है पुत्र की शादी का। जयलोकमंगल के सभी साथियों को आलू-बड़ी का झोर मुबारक..
पंडित सुरेश नीरव
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मूल-ताबिश देहलवी
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
लाजवाब ग़ज़ल 
 ताबिश देहलवी की बेहतरीन ग़ज़ल मृगेन्द्र मकबूलजी आपने पेश की है। पढ़कर मजा आ गया।
 तोड़ो दिल को शौक से तोड़ो
चीज़ मेरी नहीं, तुम्हारी है।
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बारे- हस्ती उठा सका न कोई
ये गमे- दिल जहां से भारी है।
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और इस शेर का तो जबाब ही नहीं है,लाजवाब शेर हुआ है-
आँख से छुप के दिल में बैठे हो
हाय कैसी ये पर्दादारी है।
सुभान अल्लाह..
ए.वी.हंस
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हंसजी को कोटि-कोटि प्रणाम
अमितजी आपने श्री भगवानसिंह हंसजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर जो टिप्पणी की है वह सोलह आने सही है। उनका भरत चरित महाकाव्य यकीनन हिंदी साहित्य की धरोहर है। और उसे लोगों ने श्रद्धा और सम्मान दोनो प्रदान किये हैं। मैं श्री हंसजी की प्रतिभा का कोटि-कोटि सम्मान करता हूं।
इन पंक्तियों ने बहुत मन को आंदोलित किया है-
मन मैला न कर प्रिय कुमारा. राम   लक्ष्मण से   यों उचारा .
वह भरत मुझे परम
 दुलारा है. दूषित राज्य को मैं स्वीकार नहीं करूंगा. हे प्रिय लक्ष्मण! तुम मन मैला मत करो. राम ने लक्ष्मण से इस प्रकार कहा.
ऐसा
 सुनकर राम सेलखन   भरे   अरु  रोष.
बाण
 गहि कर कर फड़काकहि उनका ही दोष.
राम से
 ऐसा सुनकर लक्ष्मण और रोष भरने लगा. और वाण को हाथ में लेकर वह फडकने लगा. तथा उसने उसका ही दोष बताया.
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