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Tuesday, December 27, 2011

मेरी दक्षिण अप्रीका यात्रा

पंडित सुरेश नीरव
 सफरनामा-
गांधी की प्रयोगभूमि से नेल्सन मंडेला तक का दक्षिण अफ्रीका
पंडित सुरेश नीरव
पंडित सुरेश नीरव
मध्यप्रदेश ग्वालियर में जन्मे बहुमुखी रचनाकार पंडित सुरेश नीरव की गीत-गजल,हास्य-व्यंग्य और मुक्त छंद विभिन्न विधाओं में सोलह पुस्तकें प्रकाशित हैं। अंग्रेजी,फ्रेंच,उर्दू में अनूदित इस कवि ने छब्बीस से अधिक देशों में हिंदी कविता का प्रतिनिधित्व किया है। हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह की मासिक पत्रिका कादम्बिनी के संपादन मंडल से तीस वर्षों तक संबद्ध और सात टीवी सीरियल लिखनेवाले सृजनकार को भारत के दो राष्ट्रपतियों और नेपाल की धर्म संसद के अलावा इजिप्त दूतावास में सम्मानित किया जा चुका है। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा आपको मीडिया इंटरनेशनल एवार्ड से भी नवाजा गया है। आजकल आप देश की अग्रणी साहित्यिक संस्था अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।


दक्षिण अफ्रीका जहां से कभी महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार की रंगभेद नीति के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत कर ब्रिटिश सरकार को ललकारते हुए वहां के निवासियों को आजादी और अपने अधिकारों को हासिल करने का मूलमंत्र दिया था और एक लंबी लड़ाई के बाद आखिर ब्रिटिश उपनिवेश की हुकूमत को 27 अप्रैल1994 को उखाड़कर अंततः यहां की जनता ने आजादी हासिल की। गांधी की उस प्रयोग-भूमि को देखने की साध मन में बहुत दिनों से थी। जो आज पूरी होने जा रही थी। हमारी जेब के रुपए रेंड में तब्दील हो चुके थे। नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एअरपोर्ट से एमीरेट एअऱलाइंस की उड़ान से हमारी चाहत को-जैसे पंख लग गए। और दुबई में एक संक्षिप्त-से पड़ाव के बाद सुबह हम जोहनेसबर्ग पहुंच चुके थे। कलाई में बंधी घड़ियों ने ढ़ाई घंटे के फर्क की हमें सूचना दी। हाथ में तख्ती लिए गाइड मुस्तैदी से वहां खड़ा हमारा इंतजार कर रहा था। सुखद आश्चर्य था कि हमारा गाइड हिंदी बोल और समझ सकता था। एक अनजान देश में अपने को अपने देश से जोड़ने का भाषा-सूत्र हमें मिल गया था। यहां हमें जिस होटल में ठहराया गया वह एअरपोर्ट से 300 कि.मी. दूर थी। यानी कि दिल्ली से ग्वालियर की दूरी। जहां बस से जाने में भारत में कम-से-कम 5 घंटे तो लगते ही मगर बढ़िया सड़क और तेज़ रफ्तार बस की बदौलत ये दूरी हमने सिर्फ दो घंटे में तय कर ली। होटल के काउंटर पर ऑन ड्यूटी एक तोते ने तीन बार वेलकम कहकर हम सभी का बारी-बारी से स्वागत किया। यकीन हो गया कि वाराणसी के प्रसिद्ध पंडित मंडन मिश्र के तोता-मैना के संस्कृत श्लोक बोलने की बात महज़ कपोल कल्पना नहीं थी। बल्कि ठोस सचाई थी। धूलहीन,कूड़ाविहीन और गढ्ढे रहित सड़कों को देखने के बाद हब्शियों का देश और हब्शी गंदे होते हैं, यह स्वदेशी मिथ भी यहां आकर पूरी तरह टूट गया। इतनी ज्यादा साफ-सफाई देखकर पहली नजर में ही यकीन हो गया कि हम अपने शाइनिंग इंडिया में नहीं हैं। रेल्वे स्टेशन,बसटर्मिनल सभी सजे-धजे,चिकने-चुपड़े। मानो अभी-अभी ब्यूटीपार्लर से बाहर निकले हों। जोहनेसबर्ग का उत्तरी इलाका पॉश इलाका है जहां आज भी धनी अंग्रेजों की बड़-बड़ी कोठियां हैं। ये बात और है कि इसी इलाके में नेल्सन मंडेला का भी आवास है। यहीं है विश्वप्रसिद्ध जोहनेसबर्ग स्टेडियम।  जिसमें सन 2010 में वर्ड कप खेला गया था। यहीं पर बना है एलिस पार्क फुटबॉल स्टेडियम। और आसमान छूता जोहनेसबर्ग एकेडिमिक हॉस्पीटल। यहां का सेंडटन इलाका बहुत तेज़ी से एक नए शहर की शक्ल ले रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर का वेंडरेरर्स क्रिकेट स्टेडियम अभी-अभी यहां बनाया गया है। यहीं हैं जोहनेसबर्ग वि.वि.,रेडियोपार्क सेंटर, वाइल्ड लाइफ कॉर्बेट पार्क,पार्क स्टेट रोज़बैंक और ग्रीन साइट-जैसे वो ठिकानें जो हर सैलानी का मन मोहने की किंगसाइज दमखम रखते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस शहर की आबादी सिर्फ दो लाख है। मगर  बिना रजिस्ट्रेशन अवैध ढंग से रहनेवालों की भी यहां खासी आबादी है। हम लोग होटल में तरोताज़ा होने के बाद शहर में गाइड की सरपरस्ती में घूमने निकले। रास्तेभर वो भला आदमी हमलोगों को रात में नाइटवर्डलाइफ देखने चलने के लिए उकसाता रहा। बेहद सर्द रात में ठंड में ठिठुरते हुए हम लोगों को एक खुली शिकारी बस में बैठाकर संरक्षित वन में ले जाया गया। ड्राइवर के पास एक सहायक सर्च लाइट लिए बैठा था। जिसे कि वो रह-रहकर जंगल की झाड़ियों में फेंकता चल रहा था। उसके मुताबिक हमलोगों को थोड़ी ही देर में मस्ती में घूमते हुए शेर के दर्शन होनेवाले थे। इस कथित रोमांच के लिए हमलोगों से टिकट के नाम पर खासे रैंड वसूले गए। अचानक आसमान में छिटकी चांदनी गायब हो गई। यकबयक हमें अपने देश की पावरकट-संपन्न बिजली व्यवस्था याद आ गई। अगले ही पल हमें याद आया कि  अरे आज तो खग्रास चंद्रग्रहण है। पूर्णिमा में अमावस्या का आनंद तो ले लिया मगर खरगोशों,बारहसिंगाओं,जंगली भैंसों और हिरणों के अलावा चंद नेवलों से रू-ब-रू होकर  मुंह लटकाए हम लोग बेरंग होटल लौट आए। आखिर शेर जंगल का राजा है। उसके मूड के आगे किसी का क्या बस चलता। सभी के मन बुझे-बुझे थे मगर रात को हमें जिस होटल में खाना खिलाने ले जाया गया वहां के माहौल को देखकर सचमुच सबका मन बाग-बाग हो गया। तमाम घने दरख्तों के साए में पहली मंजिल पर बना डाइनिंग हॉल। नीचे बहता हुआ झरना। इंजीनियरिंग का ऐसा नायाब नमूना वाकई हैरत अंगेज़ था। विशाल टेबलों पर वेज और नॉनवेज पकवानों को बड़े करीने से सजाया गया था। हम और हमारे कई साथी यहां एक हादसे की जद में आने से बाल-बाल बचे। हुआ ये कि यहां गौमांस को  बाकायदा वेजीटेरियन आयटम माना जाता है। हम लोग इसे चीज़ समझकर अपनी-अपनी प्लेटों में डाल ही रहे थे कि तभी एक गुजराती देवदूत ने हम सबको पथभ्रष्ट होने से बचा लिया। जब गौमांस शाकाहारी हो तो अंडा तो बिंदास लहज़े में यहां शाकाहारी होने का दम भरता है। खैर..इस दुर्घटना से बचकर पेट पूजाकर हमलोगों ने अपनी होटल की ओर प्रस्थान किया और अलसुबह ब्रेकफास्ट लेकर सनसिटी घूमने निकल पड़े। और तीसरे दिन जा पहुंचे कैपटाउन। क्लिफ्टन के किनारे बसा एक बेहद खूबसूरत शहर। और आबादी के मामले में दक्षिण अफ्रीका का दूसरे नंबर का शहर। पेनेसुला पर्वत श्रंखला के साये में बसा बेहद खूबसूरत शहर। कुदरत की खूबसूरती और इंसान निर्मित खूबसूरती का अदभुत संगम। वर्डकप के दौरान बना कैपटाउन स्टेडियम इस शहर की जान और शान है। इस स्टेडियम के बनने के बाद बची ज़मीन पर बसाया गया बॉयोडाइवर्सिटी पार्क इंसान की कुदरत के प्रति बफादारी का एक बेशकीमती नमूना है। पेनेसुला पर्वत श्रंखला के साथ-साथ 60 किलोमीटर में फैला टेबल मांउटेन नेशनल पार्क। अफ्रीकन शेर, राइनो, बबून्स, शुतुरु्मुर्ग, और रंगीन बतखों-जैसी विभिन्न जीव-जंतुओं की 250 प्रजातियों से सजा-धजा यह अभयारण्य अपने आप में बेजोड़ है। यहां नेवलों की एक अलग ही दुनिया आबाद है। शेर के बच्चों के साथ खेलने का भी यहां दिलचस्प इंतजाम है। सैलानी लंबी लाइनों में टिकट लेकर इन सिंह शावकों के साथ खेलने का दुर्लभ लुत्फ उठाते हैं। और  पूरे गुरूर के साथ इनके साथ फोटो भी खिंचवाते हैं। बड़े-बड़े शेरों की यहां इंसान से इतनी जान-पहचान हो चुकी है कि वे आदमी के पास से बड़े शांत भाव से निकलते रहते हैं। आप बेखौफ इनके फोटो खींच सकते हैं। प्रोफेशनल मॉडल की तरह ये बड़ी शोख अदाओं में फोटो खिंचवाकर आगे बढ़ जाते हैं। हमने सुना था कि जंगल में केवल एक ही शेर होता है मगर यहां शेरों के लंबे-चौड़े कुनबों को देखकर एक और गलतफहमी दूर हुई। यहां रबड़ की तरह चिकनी त्वचावाली पत्तियों से लदी फाइनबुश का पूरे दक्षिणी अफ्रीका में साम्राज्य है। प्रवासी पक्षियों के यहां दो नेचर रिजर्व्स हैं। रोंडेवेई नेचर रिजर्व और रियेटवेई नेचर रिजर्व। जिनमें कि 173 प्रजातियों के पक्षी इनकी शोभा बढ़ाते हैं। वनस्पति जगत में रुचि रखनेवाले सैलानियों के लिए यहां एक विशाल बोटेनिकल गार्डन भी है,जिसमें केक्टस की एक-से-एक खूबसूरत प्रजातियों को देखर अनायास ही मुंह से निकल पड़ता है कि- वाह यह कौन चित्रकार है। जिसने इन  लाजवाब खूबसूरत कलाकृतियों को बनाया है। लेकिन साहब यहां के विशाल समंदर के किनारे जाकर हमें बड़ी दुर्दांत निराशा हुई क्योंकि भारत के समुद्र तट की तरह न तो यहां भेल-पूरी बिक रहीं थीं,न कोई मालिशवाला घूम रहा था और न प्रेमी जोड़े थे। और-तो-और किनारे टहलते कुत्ते और गाय-मवेशी तो क्या पॉलीथिन के टुकड़े और चाट के झूठे दौने तक नहीं थे। सिर्फ लहरों के रथ पर दौड़ लगाता साफ-स्वच्छ समंदर और किनारे रेत की जगह मखमली हरियाली बिछी हुई थी। हब्शियों के देश में इतनी सफाई। रूह में इंडियन गुस्सा फुफकारने लगा। अलबत्ता काफी दूरी पर यहां समुद्री सीप,शंख और शैलों के बने खिलौनों की दुकानें जरूर थीं। समुद्र का भ्रमण करते हुए समुद्र के बीच सीने पर उगे पहाड़ों पर हमने कुछ जीव देखे जिनकी कद-काठी तो बकरी की तरह थीं मगर खाल भैंस की तरह चिकनी। ये पानी से निकलकर इन पहाड़ों पर तसल्ली से धूप सेंक रही थीं और पर्याप्त सनबाथ लेने के बाद फिर पानी में छपाक से गोता लगा देतीं। ये सील मछलियां थीं। जो कि घंटों पानी से बाहर रहकर जिंदा रहने की कुव्वत रखती हैं। किनारे-किनारे अलमस्त लामाओं की तरह गहन गंभीर चाल में धीरे-धीरे चलते हुए पेग्विन्स भी यहां देखने को मिले। जो सैलानियों के साथ बहुत दूर तक पैदल-पैदल चलकर अपनी मेहमाननवाजी का इजहार करते हैं। यहा एक दर्शनीय आस्ट्रिच पार्क है। जहां आकर यदि दो-तीन क्विंटल के शुतुरमुर्ग न देखे होतो तो एक हकीकत के प्रति इंसान का चिंतन शुतुरमुर्गीय ही रह जाता है। जानकारी मिली कि पैदा होते ही इन शुतुरमुर्गों को खाने में कंकड़ और पत्थर के टुकड़े दिये जाते हैं जिन्हें ये ताउम्र बड़े शौक से खाते हैं। ताकत का आलम ये कि अगर अपने मूड में आकर चीते को पूरी ताकत से पंजा मार दें तो उसकी बत्तीसी जबड़े सहित बाहर आ जाती है। डायनासॉर का समग्र कंकाल भी हमें यहां देखने को मिला। जिसे देखकर उसकी विशालता का एक ट्रेलर हमें अपनी झलक दिखा गया। एक बात और..दक्षिण अफ्रीका में हीरों के बड़े-बड़े शोरूम इफरात में हैं। एक साथ सौ ग्राहकों को अपने दामन में समेट लेनेवाले शोरूम। हीरे की शुद्धता का मापन करनेवाली प्रयोगशालाओं से लैस शोरूम। जिनमें प्रवेश करने पर कंप्लीमेंट्री शैंपेन भी ग्राहकों को परोसी जाती है। जिसके आकर्षण में पायेदार जौहरियों की तरह हमलोगों ने एक-एक हीरे की खूब बारीक पड़ताल की। भले ही हम लोगों ने हीरे न खरीदे हों मगर दस दिनी प्रवास में नए तजुर्बों के बेशकीमती हीरे अपने सीने में समेटे हमलोग केपटाउन से दमतोड़ती नदियोंवाले अपने टोपियों के देश भारत में वापस लौट आए। आज भी दक्षिण अफ्रीका की मधुर यादें जब भी जहन में महकती हैं लगता है जैसे नेल्सन मंडेला ने महात्मा गांधी के लिए कोई खूबसूरत पैगाम भेजा है।
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