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Saturday, March 10, 2012

सोच में डूबी मही है


प्राक्कथन-
अनूठी ऊर्जाओं का मंगल नृत्य
ज़िंदगी हम में से ऐसे निकलती है जैसे वृक्ष से पत्ते निकलते हैं। कुछ ऐसा ही ज़िंदगी का  भी गीत-व्याकरण है। ज़िंदगी गीत में है और गीत ज़िंदगी में है। प्रकृति ने हमें इसी गीतविधान में रचा है। सबकुछ अनुशासित और लयबद्ध। हर बीज की सर्वोच्च चाहत होती है वृक्ष हो जाना। और हर बीज के नेपथ्य में एक वृक्ष विश्राम करता है। ठीक वैसे ही जैसे ईश्वर सृष्टि का निर्माण करता है और खुद उसके कण-कण में रहता है। वह सृष्टि का निमित्त भी है और निर्माता भी। वह सृजन की प्रकृति भी है और आनंद भी। मगर जब प्राणी के प्राणों की मुट्ठी से जीवन का आनंद रेत-कणों-सा झिरने लगता है तो पृथ्वी भी सोच में पड़ जाती है। आज का सापेक्ष सत्य भी यही है कि सोच में डूबी मही है। लेकिन यही सोचमग्न मही जब रचनाकार के सोच में डूबती-उतराती है तो सृजन का जो अद्वैत निर्मित होता है वही अनिल कुमार के गीतों का भावलोक है। जहां धारणा और अवधारणा की द्विपदी श्लोक चेतना अपनी ऋचा दृष्टि से समकालीन सच को निहारती है। और अपनी पाकीज़ा,मुकद्दस तुलसी जुबान में ऐसी शिद्दत के साथ उसे अभिव्यक्त कर देती है कि पढ़ने-सुननेवाले के मन-प्रयाग में अनूठी ऊर्जाओं का मंगल नृत्य आरंभ हो जाता है। ऐसा मंगल नृत्य कि अपने ही अस्तित्व के निःशब्द को ओढे बैठा अनहत् अपने आप ही उसके अंतस में बज उठता है। यह प्रकृति के संगीत और चेतना के मौन का लयबद्ध नृत्य है। जो गीतधर्मी अनिल कुमार की शुभात्मक कथन भंगिमा के वादन से संबद्ध है। गहराई से सोचें तो अनिल का मूल चरित्र ही सामुदायिक होता है। अनिल वायु है। और वायु देवता है। यह एक में भी अनेक है। इसके साथ उनन्चास और वायु भी हैं जो उप देवता हैं। दिव्यता का यह दिव्यमंडल ही वायुमंडल है। जिसका सिरमौर है-अनिल। जिसके लिए कुछ भी असहज नहीं। सबकुछ सरल और विरल। जिसकी सामर्थ्य का अंश मात्र ही आत्मज हनुमान में स्थानांतरित हुआ तो वे सूर्य को मुख में रखने में समर्थ हो गए। तो फिर अनिल का  आजकी चिंताकुल और सोचमग्न मही के कष्ट निवारण के लिए अपनी लघुमा-अणिमा और महिमा सिद्धियों के साथ गीतों में रच-बस जाना सहज स्वाभाविक ही है। भूमंडलीय चिंतना और सामाजिक सरोकारों से लैस अनिल औसत गीतकारों की तरह अपने गीतों में कृत्य की तरह नहीं बल्कि पूरे अस्तित्व के साथ उतरे हैं। इसीलिए सोच में डूबी मही है के सर्जक अनिल मीडियाकर्मी या रंगकर्मी की तरह महज गीतकर्मी नहीं है बल्कि गीतधर्मी हैं। गीत-प्राण हैं। जो प्रकृति को छूते हैं तो उसके ऋषि-प्राणों में भी गीत की लचकन और खनकन भर देते हैं। यथा-
शरद धूप-सा मुखड़ा,किरण सरीखा अंग
प्राची पर फैली लाली-सी मोहक तेरा अंग
चमचम चांदी-सा लगता है अनुपम यौवन गेह
होठों से बह रहा मालकौंस का गेह
                      (मोहक तेरा अंग)
किस करीने से प्रकृति का मानवीयकरण किया है। कुंठा और संत्रास के सलीबों को अपने ही कंधे पर ढोते थके-टूटे-हांफते हुए गीतों के रुग्ण टापुओं में ताज़ी हवा के झौंके के अहसास की तरह उतरते हैं,ये गीत। अभिव्यक्ति की यह पाणिणी-सूत्रता यह जताने के लिए काफी है कि गीत का जितना लंबा सफर अनिलजी ने बाहर तय किया है भीतर उतनी ही गहरी गीत-यात्रा को भी इन्होंने अहिर्निश जिया है। तभी तो हर अक्षर जलता दीपक है और शब्द-शब्द में महमह चंपक है। और जब चेतना में अक्षर दीप अपनी दीप्ति से प्रदीप्त होता है तो अपने आप एक अशरीरी महसूस चेतना की धमनियों में उतरता है जहां-
सांस संदल,अगर-सी जलती महक है
नज़र में भी दीप-सी जलती महक है
                     (हर मुंडेरा जगमगाता)
झौंपड़ी को रोशनी मिलती नहीं है
और छत पर चांदनी खिलती नहीं है
मेघ से घिर दिन अंधेरा ढो रहा है

 तो उस दौर में जहां आज उत्सवों में रौनक की कमी और हर खुशी में बस उदासी और गमी हो, जहां कि निराशा के अंधे कुएं में पड़ा कोई आदमी बाहर निकलने को छटपटा रहा हो अनिल के गीत उसे उम्मीद की सिर्फ एक सीढ़ी ही मुहैया नहीं कराते हैं बल्कि बाहर और भीतर के अंधेरे से लड़ने का हौंसला भी देते हैं। एक तरह से ये गीत आभ्यांतरिक अरुणोदय की तरह हमारे भीतर कहीं घटित होते हैं। एक बात और जो गीतकारों की भीड़ से अनिल कुमार को एक अलग शिनाख्त अता करती है वह है इनका विराट वानस्पतिक अभिज्ञान। वट अब हाथ मले एक ही गीत मे कदंब, करौंद, जामुन, अंब, बेल, इमली,खजूर, नीम, पीपल, ताड़, अमलतास, चिनार,केसर,देवदार,कपास,महुआ और कनेर सहित अठारह वृक्षों और पौधों को जिस हरियाले मन से अनिल ने अपनी  कविता के धागे से अनुस्यूत कर जिस उत्पलारण्य की निर्मिति की है,वह टूटी कमरवाली खुशी के जीर्ण-शीर्ण गात को भी अपने शहदीले स्पर्श से मदन-मदिर बनाने की आरोग्यवर्धक क्षमता रखता है। कुल मिलाकर सोच में डूबी मही है के गीत ऊंघती मनुष्यता की सार्वजनिक नींद को झकझोर कर छिटक देनेवाले नव-जागरण का मंजु घोष हैं। संत्रणा और यंत्रणा का यह एक ऐसा यौगिक युयुत्सु हैं जहां स्थावर में जंगम टहलकदमी करता है। और वह भी किसी बैचारिगी की मुद्रा में नहीं बल्कि शब्द ऐश्वर्य और अर्थसंपदा के कालजयी अहोभाव से भरकर। शाख से जुड़े उस फूल की तरह जो खुद कहीं नहीं जाता मगर गंध उसके अस्तित्व की व्याप्ति बनकर दिशाओं के कान में उसके होने की सूचना दे देती है। यह संग्रह भी गीत विश्व में अनिल कुमार के होने की एक सुखद,गंधवान और आदमकद शुभसूचना है। जिसकी बहुत दिनों से सुधि गीत-रसज्ञों को प्रतीक्षा भी थी। आइए गीतमुखी मंगल उत्साह से भरकर हम इस मानद हस्ताक्षर का स्वस्ति सत्कार करें। इत्यलम्...
                                                   पंडित सुरेश नीरव
                                                    (कवि-गीतकार)
                                              आई-204,गोविंदपुरम,ग़ज़ियाबाद
                                                   मोबाइल-09810243966

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