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Sunday, June 10, 2012

याद रहे आज बिस्मिल जयंती है पर बधाई नहीं दूंगा-------।




दोस्तों कई दिन से सोचे बैठा था कि ११ जून को बिस्मिल जयंती पर उस महान क्रांतिकारी के विषय में अच्छा सा लेख लिखूंगा।पर आज फेसबुक खोलते ही शाहजहांपुर समाचार द्वारा प्रेषित समाचार में अमर शहीद रोशनसिंह के विपन्न परिवारी जनों(झोपडी तक जला दी गई) पर हुये अत्याचार का चित्र सहित विवरण देखकर मन पहले क्षुब्ध और बाद में अपनी लाचारी पर खिन्न और शर्मिंदा हो उठा।'शाहजहांपुर समाचार'के संपादक जगेंद्र सिंह से बात की तो पता चला कि उनके अलावा किसी अन्य पत्रकार ने इस समाचार में कोई रूचि नही दिखाई।राशिद हुसेन राही और संजीव गुप्ता को मैसेज किया उन्होनें भी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नही की।इसी बीच मेरी पोस्ट पर श्रीकांत मिश्र कांत जी ने मेसेज किया कि कुछ करना चाहिये पर क्या ? फिर जगेंद्र सिंह से बात की शाहजहांपुर के एस०पी०,डी०एम० के नंबर लिये उदयप्रताप सिंह और अखिलेश यादव को मैसेज किया पर जब वहां के सपा विधायक राममूर्ति वर्मा ही उन गुंडों के साथ घूम रहे हैं --------------।अपने कुछ निज़ी मित्रों पत्रकारों से कहा या मानो गिडगिडाया आप कुछ करो--।पर स्वयं से एक सवाल बार-बार कर रहा हूं कि मैं और मेरे जैसे लोग लोग जो वास्तव में अन्याय के विरूद्ध खडे होना चाहते हैं इसी व्यवस्था के आगे गिडगिडाने को मज़बूर क्यों हैं?
रात के लगभग डेढ बजे यह पोस्ट लिखते हुये आज बिस्मिल जयंती की बधाई देने का बिल्कुल मन नही है।बिस्मिल जी ने अपनी आत्मकथा में बार-बार समाज की कायरता का ,धोखों और षडयंत्रों का ज़िक्र किया है उस काल की तुलना करता हूं तो लगता है कुछ भी तो नही बदला।अमरशहीद अशफाक उल्ला खां की मज़ार के लिये चंदा गणेश शंकर विद्यार्थी को करना पडता है पर आज जब उनके कथित पौत्र उनके नाम पर देश भर में सम्मान लेते हैं तब भी उन्हें अपने दादा की मज़ार घूमते सुअर और कुत्ते दिखाई नहीं पडते।प०रामप्रसाद बिस्मिल का मकान जिसे स्मारक होना चाहिये था और कई वर्ष पूर्व तत्कालीन श्रम मंत्री साहिब सिंह वर्मा ने उस मकान को खरीद कर भव्य स्मारक बनवाने का वादा हम कुछ मित्रों से किया था पर अपना वादा पूरा करने से पूर्व ही वे दिवंगत हो गये।
शाहजहांपुर में पं० रामप्रसाद बिस्मिल के नाम पर अस्पताल से लेकर कालोनी और शहीद स्मारक भी है पर भव्य स्मारक बनवा के वोट की राजनीति करने वाले क्या कभी उन ज़िंदा स्मारकों की भी सुध लेंगे जो आज थाने और पुलिस के चक्कर काट रहे हैं।
शाहजहांपुर के वे कवि और पत्रकार क्यों खामोश हैं जो कही भी जाते हैं तो खुद को शहीदों की नगरी से आये बताकर तालियां बजवाते नहीं अघाते।शायद शाहजहांपुर के लोगो को लक्ष्य करके ही बिस्मिल जी ने लिखा था--
तलवार खूं में रंग लो अरमान रह ना जाये
बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह ना जाये।
मित्रों शहीदों को लेकर पहले जब भी मैने को पोस्ट या लेख लिखा तो एक आध प्रतिक्रिया ऐसी भी आई है जैसे मैं शहीदों का स्वयंभू प्रवक्ता बन गया हूं।एक मित्र ने तो एक बार यह भी लिख दिया कि आप भी इसी व्यवस्था में हैं।
तो आप से मुझे यही कहना है कि आप के सारे इल्ज़ाम सर -माथे पर कुछ करो कम से कम अपनी नज़रों से गिरने से बचने के लिये ही सही ।राजनीति से कुछ उम्मीद नहीं कलम वालों तुम्ही कुछ करो ।याद रहे आज बिस्मिल जयंती है पर बधाई नहीं दूंगा-------।
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