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Sunday, October 28, 2012

२६ अक्टूबर को खंडवा के भाई राजेंद्र परिहार ने एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के लिये आमंत्रित किया




मित्रों कई बार गंभीर लेखन समसामयिक संदर्भों से काट देता है।हिंदी काव्य मंचों की स्थिति जैसी भी है किस से छिपी नही है परंतु आर्थिक रूप से हिंदी कविता को जो सशक्त आधार कवि सम्मेलनों ने दिया है उसे भी नकारा नहीं जा सकता।'बिस्मिल चरित'के लेखन के दौरान शोध करते हुये और फिर बिस्मिल जी के चरित्र से अभिभूत हो जिन चीजों को मैने अपने जीवन -मूल्यों में शामिल कर लिया वे मंचीय  सक्रियता में आडे आती हैं नतीजा यह हुआ कि मेरी काव्य यात्रायें सीमित और चूजी होती गयीं।कुछ मित्रों के आग्रह पर गया तो चुटुकुलों और कविता की चौर्य परंपरा के विरूद्ध वक्तव्य दे दिया। नतीजा ये हुआ कि जिसे आज हिंदी मंचीय कविता की मुख्य धारा कहते हैं उसके लिये मेरी मंच पर उपस्थित असहनीय होती गयी फिर भी मंच को अलविदा ना कहने के पीछे मेरा सदैव ये विचार रहा कि ओछे लोगों के लिये खुला मैदान छोड देना भी अपराध से कम नही होगा।दूरदर्शन,आकाशवाणी स्तरीय कवि सम्मेलनों का संयोजन तथा शालीन संयोजकों की तलाश कभी बंद नही की।
राजधानी दिल्ली में हिंदी अकादमी दिल्ली ने मुझे सर्वप्रथम मंच प्रदान किया वर्ष १९९५ में और १९९९ के बाद शायद ही हिंदी अकादमी ने मुझे कभी आमंत्रित करने का दुस्साहस नहीं किया भाबज़ूद इसके कि मा सरस्वती की कृपा से मंच पर कभी भी असफलता का मुंह नही देखना पडा ,अकादमी की बेरूखी के कारणों की चर्चा फिर कभी।
      इस बीच कवियो की पूरी एक ऐसी पीढी आ गयी जिसने हिंदी कविता की आधुनिक-आक्रामक शैली में मार्केटिंग की और अनौपचारिक बातचीत में स्वयं को इंटरटेनर कहना शुरू कर दिया।याने मंच पर मजा आना चाहिये।लाफ्टर शो के पराजित योद्धाओं ने शिष्ट हास्य-व्यंग्य का तो लगभग अंतिम संस्कार ही कर दिया।

१९९९ से लेकर आज २०१२ तक १३-१४ साल के लंबे वक्त में पं० सुरेश नीरव ने हिंदी काव्य मंचो पर मुझे मेरे तेवरों के साथ जीवित जो भूमिका निभाई वह तो कोई पिता भी किसी पुत्र को स्थापित करने के लिये नहीं निभाता उनके इस रिण को मैं  उतार ना भी नही चाहता।

२६ अक्टूबर को खंडवा के भाई राजेंद्र परिहार ने एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के लिये आमंत्रित किया ।यह कार्यक्रम इस मायने में विशिष्ट रहा कि भाई वेदव्रत वाजपेयी जो सदैव ही मंच के सफल राष्ट्रवादी कवि रहे हैं ने अपनी कविता को नारेबाज़ी के स्वर से मुक्त कर सही मायनों में स्थापित किया और पं० सुरेश नीरव का शिष्ट हास्य व्यंग्य को भी वही मान मिला जो वेदव्रत वाजपेयी के राष्ट्रवादी काव्यपाठ को।मेरा स्वयं का काव्यपाठ स्वयं मेरी नज़र में अत्यंत संतोषजनक रहा।जबकि मैं स्वयं से जल्दी संतुष्ट नही होता।
कुल मिलाकर इस आयोजन में हिंदी कविता ने नये आयामों को छुआ और मुझे भी पूरी सक्रियता के साथ पुनः हिंदी काव्य मंचों पर सक्रिय होने के लिये प्रेरित किया।
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