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Tuesday, November 6, 2012

जयलोकमंगल परिवार की ओर से हार्दिक धन्यवाद।

भाई प्रकाश प्रलयजी और घनश्याम वशिष्ठजी 
आप दोनों की रचनाएं पढ़कर बहुत आनंद आया। 
दोनों ही महानुभावों को जयलोकमंगल परिवार की ओर से हार्दिक धन्यवाद।
पंडित सुरेश नीरव

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एक मदिर छंद प्रस्तुत कर रहा हूँ.....चिन्तन प्रदान कीजियेगा और स्नेह प्रदान कीजियेगा

पावन निर्मल गंग बहे फिर क्यों इस भू पर क्रन्दन है
क्यों मिलते अति दीन यहाँ जब हो हरि का नित वन्दन है
क्यों ऋषियज्ञ हुए सब व्यर्थ पड़ा हवि में जब चन्दन है
कारण स्वार्थ प्रवृत्ति बढ़ी लख रावण का अभिनन्दन है

कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच. डी.
लखनऊ
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मन के कोठे पर दावत के मुजरे ढूंढ रहा हूँ मैं ,
लम्हे तेरी यादों में दो गुज़रे ढूंढ रहा हूँ मैं ,
हर सू हर मंज़र तेरी तस्वीर मचलने लगती है ,
दिल के कागज़ पर वा'दों के शज़रे ढूंढ रहा हूँ मैं |
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-------विजय प्रकाश भारद्वाज
 
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