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Saturday, December 8, 2012

गिरीश नारायण मिश्रा कालजयी सृजन में रत हैं

श्री गिरीश नारायण मिश्रा जिस कालजयी सृजन में रत हैं यह बड़ी गंभीर साधना से आता है। यकीनन आप भी सहमत होंगे,देखिये कुछ पंक्तियां-
ढोर मवेशी मैं लिखता हूँ, सानी-पानी तू भी लिख।
रात ढले जब नींद छले तो ले बच्चे को बाँहों में।
पंचतंत्र नव मैं लिखता हूँ, दादी-नानी तू भी लिख।
सबके भीतर छिपा हुआ है, वादी भी प्रतिवादी भी
और सज़ाएँ मैं लिखता हूँ, कालापानी तू भी लिख।
मौसम-मौसम साथ उड़ो, कुछ साथ चलो तो बात बने
ढोल चिरइया मैं लिखता हूँ, आँधी-पानी तू भी लिख।
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