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Tuesday, December 25, 2012

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जयंती पर-

वो सिर से पांव तक हृदय-ही-हृदय थे...

0 पंडित सुरेश नीरव
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की चर्चा करते ही अक्सर लोगों के दिमाग में एक धर्मनिष्ठ,सनातनी,परंपरावादी हिंदू की छवि उभर आती है। मगर मालवीयजी के बारे में जिन्होंने गहराई से पड़ताल करने की कोशिश की है उन्हें मालवीयजी एक धर्मनिरपेक्ष,मानवतावादी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती,हरिजनों के उद्धारक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखवेवाले एक ऐसे सेतु पुरुष लगे हैं जो आंदोलनकारियों और क्रांतिकारियों दोनों के ही बीच एक प्रतिष्ठा-पुरुष हैं और स्वाधीनता आंदोलन के ऐसे विराट सिंधु भी जहां राजनीति की नर्म और गर्म दोनों धाराएं समाहित हो जाती हैं। वे जब 15 वर्ष की उम्र में मिर्जापुर करी विद्वान सभा में बोलते हैं तो उनके धाराप्रवाह प्रवचन से संपूर्ण विद्वतजन हतप्रभ हो जाते हैं। और प्रसिद्ध विद्वान पंडित नंदा राय अपनी नुदुषी कन्या कुंदन देवी की उनसे सहर्ष शादी कर देते हैं। और जब यही मालवीयजी गोलमेज कांफ्रेंस मेंलंदन की संसद में अंग्रेजी में जलियांवालाबाग की विभीषिका का चित्रण करते हैं तो महिलाएं मूर्छित हो जाती हैं और पुरुष सांसदों की आंखें भी भर आती हैं। लोहगों को आश्चर्य होता है कि एक परंपरावादी भारतीय,जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है वह इतनी निर्बाथ और प्रभावी प्रस्तुति अंग्रेजी में कैसे कर पाया। लंदन के अखबार उस अलौकिक व्यक्तित्व की प्रशंसा से भर जाते हैं। और वह भी तब जबकि एक गुलाम देश का भारतीय,अंग्रेज सरकार के खिलाफ,उसके ही घर में आकर बोला हो। स्कॉटलैंड का वह अधिकारी जिस पर मालवीयजी की सुरक्षा का जिम्मा था-डॉक्टर एस.के.दत्त से बरबस ही कह उठता है-mahatma Gandhi is of course a saint and seer but there is something of the lord in the eyes of pt.malviya.( महात्मा गांधी महात्मा हैं ही। वह एक संत और अवतारी पुरुष हैं मगर मालवीयजी के नेत्रों में तो स्वयं ईश्वर-जैसी कोई चीज़ है। मालवीयजी की उपमा डिजरायली और ग्लेडस्टन-जैसे प्रखर वक्ताओं से की जाए और मालवीयजी का भाषण सुनकर गृहमंत्री सर विसेंट स्मिथ की पत्नी बरबर ही यह कह उठे कि मालवीयजी के बाद मेरे पति क्या बोल पाएंगे तो यह चमत्कार था मालवीयजी के व्यक्तित्व में। कहा जाता है कि मालवीयजी के पिता पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी अपने दिवंगत पिता प्रेमधर मालवीय के क्षाद्ध-तर्पण के लिए बोधि गया गए तको पुजारी ने कहा- पूर्प की ओर मुख करके सूर्य से कोई भी वरदान मांग लो,अवश्य पूरा होगा। तो उस समय पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी ने एक असाधारण पुत्र की कामना की। जिसका यश भी सूर्य के समान हो। उनकी प्रार्थना ईश्वर ने स्वीकार कर ली। 25 दिसंबर 1861(पौष कृष्णाष्टमी,मार्गशीर्ष माह) इलाहाबाद में मूना देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी ने इस नन्हे पुत्र का नाम बड़े प्यार से मदन मोहन रखा। जब बालक मदन मोदन पांच वर्ष के हुए तो इनके पिता संस्कृत के प्रख्यात विद्वान पंडित हरदेव की पाठशाला लेकर गए। प्रारंभिक परीक्षा के तौर पर पंडित हरदेव ने मदनमोहन को एक श्लोक पढ़ने को कहा। मदनमोहन ने उस श्लोक को इतने प्रभावी ढंग से पढ़ा कि हरदेवजी ने गदगद गोते हुए इनके पिताजी से कहा कि यह बालक असाधारण विद्वान निकलेगा। और यशस्वी भी होगा। बाद में हरदेवजी ने बालक मदनमोहन को लघु कौमुदी तथा भगवत गीता का अध्यापन किया और कुछ समय बाद फिर घोषणा की कि मदनमोहन का अनुशासन और प्रखर मेधा को देखकर मैं कह सकता हूं कि बालक अब उच्च-से-उच्च शित्रा प्राप्त करने में समर्थ हो गया है। इसबीच मदन मोहन के कुछ मित्र अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने जाने लगे तो इन्होंने भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने की इच्छा व्यक्त कीछ पिता की आर्थिक स्थित जब इस इच्छा के आगे प्रतिरोध बनने लगी तो माता मूनादेवी ने अपने गहने बेचकर अपने पुत्र की इछ्छा पूरी कर दी। यहां गोर्डन साहब-जैसे सख्त और अनुशासनप्रिय अध्यापक से इनका पाला पड़ा। जो ज़रा-सी देर हो जाने पर कठोर दंड देने के लिए मशहूर थे। मदन मोहन रात का खाना सुबह खाकर स्कूल पहुंचते। शाम को अपने सहपाठी के घर जाकर होमवर्क करते और फिर रात में घर पहुंचते और फिर सुबह स्कूल के लिए निकल पड़ते। बहरहाल गोर्डनसाहब को शिकायत का मौका उन्होंने कभी नहीं दिया। 1881 में मदन मोहनजी नेइंटर की परीक्षा पास की और आगे की पढ़आी के लिए म्योर सेंट्रलकॉलेज में भर्ती हो गए। 1884 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी।ए. की दिग्री हांसिल की। आगे की पढ़आी के लिए अभी सोच ही रहे थे कि आऱ्थक स्थिति फिर आड़े आ गई। एम.ए. करने के बजाय 40 रुपये महीने की सहशिक्षक की नौकरी कर उन्होंने अपने लड़खड़ते परिवार को सहारा दे दिया। इसबीच कलकत्ता में कृग्रेस का दूसरा अधिवेशन हुआ। यहां मालवीयजी ने जो भाषण दिया षउसे एक ऐतिहासिक भाषम माना गया। और यहीं से शुरू हुई मालवीयजी महाराज की राजनैतिक यात्रा। इसी मंच से जब कालाकांकर के राजा रामपालसिंह ने 26 वर्षीय मालवीयजी का भाषशण सुना तो इतने प्रभावित हुए कि तुरंत उन्हें हिंदुस्तान अखबार का संपादक भार सौंप दिया। मालवीयजी ने अपनी कुशल लेखनी से बहुत जल्द ही इस अखबार को राष्ट्रीय चेतना का प्रमुख पत्र बना दिया। सर्वत्र इनके संपादकीय कौशल की प्रशंसा होने लगी।
राष्ट्रीय चेतना का प्रतिबिंबःअभ्युदय-
हिंदुस्तान के बाद मालवीयजी ने राष्ट्रीय चेतना का समाचार साप्ताहिक अभ्युदय निकाला। यह वह दौर था जब स्वदेशप्रेम के लिए गणेशशंकर विध्यार्थी का प्रताप और मालवीयजी का अभ्युदय देशभक्ति की रामायण और गीता का दर्जा हासिल कर चुके थे। अभ्युदय में तीखे और चोखे-चुटीले व्यंग्यों से अंग्रेज सरकार पर प्रहार किए जाते और किसानो,मजदूरों और हरिजनों की बात पूरे दमखम से कही जाती। सम 1923 से1929 तक तो अभ्युदय स्वतंत्रता की रणभेरी बना रहा। भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद पर विशेषांक निकालकर इस पत्र ने पत्रकारिता के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। बाद में मालवीयजी ने इलाहाबाद के लीडर,इंडीयन यूनियन को भी अपना सरंत्रण प्रदान किया। तथा आगे चलकर सनातनधर्म पत्रिका का भी प्रकाशन शुरू कर दिया। इस तरह मालवीयजी ने विचार और अखबार दोनों के माध्यम से देश की संवेदना को वाणी दी। और अंग्रेजी हुकूमत से जंग जारी रखी।
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