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Wednesday, January 2, 2013

मोमबत्तीग्रस्त और मोमबत्तीत्रस्त देश में


           हास्य-व्यंग्य-
प्लीज़..कैंडिलमार्च करालो..स्पेशल डिस्काउंट ऑफर..
सुरेश नीरव
 कभी रहा होगा भारत कृषि प्रधान देश। इक्सवींसदी में तो यह बाकायदा विश्व का टॉपेस्टतम मोमबत्ती प्रधान देश बन चुका है। जो मोमबत्तीमस्त देश भी है और मोमबत्तीग्रस्त और मोमबत्तीत्रस्त देश भी। मोमबत्तियां हमारे देश के लोकतंत्र का राष्ट्रीय-श्रंगार हैं। पब्लिक जब कभी सरकार पर गुस्सयाती है तो लाल-पीली मोमबत्तियां लेकर वो तड़ से सड़क पर उतर आती है। और सरकार को आंख दिखाती है। सरकार को विवश करने और वश में करने का शर्तिया तिलिसल्मी जंतर-मंतर हैं ये मोमबत्तियां। प्रशासन इन मोमबत्तियों के देखकर ऐसे उखड़ता है जैसे लाल कपड़े को देखकर सांड़ बिगड़ता है। बौराया प्रशासन लाठी की मार से,पानी की धार से,प्लास्टिक की गोलियों और आंसूगैस के गोलों से और इसी नस्ल के नानाविध प्रशिक्षित कारनामों से  इन मोमबत्तियों को डराता है और फिर ऑनड्यूटी जान बचाकर हांफता-कांपता किसी जांच आयोग की गोद में जाकर दुबक जाता है। अपनी ऑलराउंड उपयोगिता के कारण आज देश में  इन मोमबत्तियों का कारोबार पक्ष-विपक्ष की अखंड सर्वसम्मति से खूब फल-फूल रहा है। रंगीन सस्ती झालरों और लड़ियों से लैस होकर इस उद्योग की वाट लगाने की दीवाली पर चीन ने जो फिर कुटिल चाल चली थी वह औंधे मुंह धड़ाम हो गई। संवेदन शील सियासत ने बिना शर्त बाहर से-भीतर से दोनों तरफ से अपना अमूल्य अनैतिक समर्थन देकर इसे डूबने से बचा लिया। और खुद भी सब्सिडी देने से बच गई। कालीन,खिलौने और इलेक्ट्रॉनिक्स के उजड़े व्यापारी आज मूंछ मरोड़ अकड़ के साथ इस मोमबत्ती उद्योग के आढ़तिये बन गये हैं। इनकी कार्यकुशलता का ही नतीजा है कि इधर हुआ झटपट हादसा और उधर फटाफट हुआ कैंडिल मार्च। हर जगह,हर मौसम में,हर समय,दिल्ली पुलिस की तरह सेवा में हमेशा तत्पर है मोमबत्ती उद्योग। निर्बाध कैंडिल सप्लाई की चाकचौबंद मुस्तैद व्यवस्था। जलूस हो या शादी,जींस हो या खादी, ग्रीटिंगकार्ड हो या ग्रेवयार्ड,बर्थडे केक या लाइफ पर लगा ब्रेक सबकी सदाबहार रौनक इन मोमबत्तियों से ही तो है। आज हर भारतीय स्वेच्छा से मोमबत्ती धर्मा हो चुका है। वह कैंडिल लाइट डिनर में खाता है, कैंडिल लाइट की रेशमी रोशनी में नाचता है,गाता है। और फिर पूरे उल्लास के साथ किसी कैंडिल मार्च में शामिल हो जाता है। कैंडिल मार्च मोमबत्ती आड़तियों की सूझ-बूझ और सरकार की समर्पण भावना के बूते आज भारत का अघोषित दैनिक सार्वजनिक व्यायाम बनता जा रहा है। वो दिन दूर नहीं जब बैंक से लोन दिलवाने की तर्ज़ पर कॉलसेंटर से मोबाइल पर फोन आने लगें कि प्लीज़..कैंडिलमार्च करालो..स्पेशल डिस्काउंट ऑफर है..। परदेशी मोसाद म्यूजियम में तो सिर्फ मोम के पुतले ही बनाकर लगाए जाते हैं अपुन का तो पूरा कंट्री ही आज मोमबत्तीमय हो गया है। इसलिए तो आजकल भ्रष्टाचार और मोमबत्ती  कारोबार में बराबरी का उछाल आया हुआ है। और इनके लुढ़कने का फिलहाल कोई चांस भी नहीं है।


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