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Friday, January 18, 2013

जागे तो सही


एक पत्नि झकझोर रही थी गहरी नींद में खर्राटे लेते हुअे पति को। पति जी थे कि आँखें ही नहीं खोल रहे थे। बड़े प्रयास के बाद जगे, तो पत्नि कुछ आश्वस्त हुई और उन आशंकाओं के भंवर जाल से बाहर आई जो उसे घोर चिंताओं में जकड़े हुई थीं। तरह-तरह के विचार उसके मन में आ जा रहे थेः-‘‘न जगे तो क्या होगा, घर कैसे चलेगा, कैसे हमें कोई बचायेगा उन लुच्चे लफंगों से जो इनके जिन्दा और जाग्रत रहते हुअे भी छेड़-छाड़ से बाज नहीं आते।‘‘ खैर वे जगे तो पत्नि ने पहला प्रश्न दागाः-क्या हुआ था जो इतनी गहरी नींद में चले गये ? पति थोड़ा आश्वस्त होता हुआ दाँयें गाल पर हाथ धरकर बताने लगा कि कल हुअे पड़ौसी से झगड़े में कैसे उसने गाल पर घूँसा मारा जिससे एक हिलती हुई दाढ़ निकल गई और तब से ही दर्द से बेहाल था। सो मैंने नींद की कई गोलियां ली और सो गया।
पत्नि सोच में पड़ गई कि वह क्या उम्मीद करे ऐसे पति से जो पड़ौसी से गाल पर मुक्का खाकर बजाय बदला लेने के नींद की गोलियों का सहारा लेता है। सोचने लगी देश की भी हालत भी तो आज इससे कुछ अधिक बेहतर नहीं है।
दुश्मन देश के कुछ उचक्के टाइप के सैनिक आये और हमारे दो वीर सपूतों के सिर काट कर ले गये। हमारे सेना के जवानों का खून खौलने लगा। देश के हर नागरिक का मन दुख और आक्रोश से भर गया। और बड़ी कातर नजर से वह सरकार की ओर देखने लगा। इन्तजार करने लगा सरकार की प्रतिक्रिया की इस जघन्य घटना के प्रति। कई दिन के बाद सरकार ने सोचा कि कुछ तो प्रतिक्रिया उसे देनी ही चाहिये नही तो आने वाले चुनाव में हालत पतली हो सकती है और संभव है कि राजसुख से हमेशा के लिये विदाई हो जाये। तो कुछ मन्त्रियों न कुछ-कुछ बोलना शुरू किया ‘‘हम पाकिस्तान पर दबाव बनायेंगे, हम विरोध जतायेंगे, हम सरहद पर फ्लैग मार्च करेंगे, हम सबूत पेश करेंगे, आदि-आदि।’’ पर किसी ने भी यह नहीं कहा कि हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। अगर हमारे दो सैनिकों के सिर कटे हैं तो हम उसके दस सैनिकों के सिर गोलियों से उड़ा देंगे।
किसी ठोस प्रक्रिया के अभाव में देश के नागरिकों में क्रोध बढ़ने लगा तो हमारे प्रधानमन्त्री जी की नींद खुली या किसी ने उनके कान में कहा कि अब उठ जाओ सोते रहने से बात बिगड़ेगी, तो वे उठे और उन्होंने अपनी सीली हुई आवाज में एक जोश भरी बात कही कि पाकिस्तान को अपनी गलती मान लेनी चाहिये, और उसे अपनी गलती माननी होगी। और नहीं मानने पर परिणाम अच्छे नहीं होंगे और आपसी सम्बन्ध जिन्हें दोनों देशों के बीच मधुरता पैदा करने वाला माना जा रहा था उन्हें बड़ा धक्का लगेगा। और निश्चित रूप में संबन्ध पहले जैसे नहीं रहेंगे।
जब प्रधानमन्त्री जी ऐसा बोले तो दूसरे मन्त्रियों ने भी कुछ-कुछ बोलना शुरू किया और अब सेना प्रमुख भी जोश में बोले कि हमें दुश्मन की ऐसी करतूतों का जवाब देना आता है। अब हमारे सैनिक अब शांत नहीं रहेंगे बल्कि ऐसी करतूतों का तुरन्त जवाब देंगे।
हम तो कहते हैं देर आये दुरूस्त आये। अरे जागे तो सही देश की 125 करोड़ जनता के प्रधानमन्त्री, भले ही आठ दिन बाद ही सही, भले ही मुख्यमंत्री दिल्ली श्रीमति शीला दीक्षित के गलती से निकले ब्यान के बाद ही सही।
देखना ये है कि अब कार्यवाही क्या होती है। वैसे हमारे देश की एक परिपाटी यह भी है कि बड़ी से बड़ी घटना/दुर्घटना की मौत खुदबखुद कुछ समय बाद हो जाती है। क्योंकि इस विकासशील देश की जनता के पास इतना समय नहीं कि सई साँझ के मरे हुअे के लिये रातभर रोती रहे। सरकार को भी इसी बात का इन्तजार रहता है कि अमुक घटना, दुर्घटना या किसी बड़े घोटाले से उपजा तूफान कब शान्त होता है, कब लोग अपने-अपने काम पर लोटते हैं और एक अफसोस मन में लिये दुखी मन से अगली घटना घटने का इन्तजार करते हैं।
हम सबको मिलकर यह प्रयास करना चाहिये कि ऐसे मौकों पर जगी हुई जनता को सोने नहीं देना चाहिये। अत्याचार के विरूद्ध उपजे जोश को शान्त नहीं होने देना चाहिये, किसी न किसी रूप में जोश की वह लौ जलती रहनी चाहिये जिसकी रोशनी सोई हुई सरकार को जगाती है। इस रोशनी की मशाल को जगाए रखने की ताकत अब केवल नौजवानों के हाथों में है और आने वाले समय में देश की बागडोर भी देशके लोग उन्हीें के हाथों में देखना चाहते हैं। साथ ही वे आज के नेताओं का दुश्मन द्वारा किये गये ऐसे बर्बर कृत्य के लिये गिड़गिड़ाता हुआ विरोध नहीं देखना चाहते।

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