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Thursday, March 28, 2013

माननीय रेलमंत्रीजी को लेखकों की ओर से रेल्वे स्टेशनों पर साहित्यिक पुस्तकों की अनुपलब्धता के संबंध में एक ज्ञापन


अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति
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लेखकों-कवियों और पत्रकारों की ओर से माननीय रेलमंत्रीजी को लेखकों की ओर से रेल्वे स्टेशनों पर साहित्यिक पुस्तकों की अनुपलब्धता के संबंध में एक ज्ञापन कुछ ही दिनों में दिये जाने का समवेत निर्णय विभिन्न संस्थाओं द्वारा लिया गया है। हम आपके विचारों को भी आमंत्रित करते हैं। निरर्थक लाइक्स के बजाय अपने विचार और सुझाव दें ताकि उन्हें ज्ञापन में शामिल किया जा सके।
-पंडित सुरेश नीरव
राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति
       (देश की समस्त भाषाओं के विकास के लिए प्रतिबद्ध साहित्यिक मंच)
प्रतिष्ठार्थ-
माननीय श्री पवन कुमार बंसलजी
  केन्द्रीय रेलमंत्री,भारत सरकार
विषयः रेल्वे स्टेशनों पर साहित्यिक पुस्तकों की अनुपलब्धता।
महोदय,
निवेदन है कि आजकल रेल्वे स्टेशनों पर बने बुक स्टॉलों पर यात्री-पाठकों को साहित्यिक पुस्तकें उपलब्ध नहीं हो रही हैं। जबकि एक दौर था जब इन स्टॉलों के जरिए ही उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेम चंद,वृंदावन लाल वर्मा,शरद चंद,बंकिम चंद,आचार्य चतुरसेन शास्त्री,अमृता प्रीतम और ओशो रजनीश-जैसे अनेक प्रतिष्ठित लेखकों की पुस्तकें रेल्वे के बुक-स्टॉलों पर बड़ी आसानी से यात्री-पाठकों को मिल जाया करती थीं। आज स्टॉलों पर इन पुस्तकों की जगह दोयम दर्जे की पत्रिकाओं ने ले ली है। इस संबंध में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पाठकों ने संपादक के नाम पत्र लिखे, फेसबुक और ब्लॉग-जैसे सोशल मीडिया मंच के जरिए पाठकों और लेखकों ने अपनी आवाज भी उठाई मगर आज तक इन स्वेच्छाचारी बुक स्टॉलों से अच्छी किताबें नदारद ही हैं। पूछने पर जवाब मिलता है कि प्रकाशक आजकल हमें किताबें नहीं देते हैं। देश के विभिन्न वरिष्ठ प्रकाशकों से जब लेखकों, पत्रकारों और पाठकों ने संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि ये बुक स्टॉल मालिक हमारी किताबों का पेमेंट ही नहीं करते हैं और काफी दिन पुस्तकें रखने के बाद कटी-फटी हालत में उन्हें वापस भेज देते हैं। इन स्टॉल मालिकों का दबाव है कि हमारा कमीशन बढ़ाओ तभी हम किताबें बेचेंगे। इस संबंध में अब देश के सारे प्रकाशक भी इन स्टॉल मालिकों के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। और पिछले बकाया पमेंट मिलने तक इन्होंने भी अपनी सप्लाई सिद्धांततः बंद कर दी है। प्रकाशकों का कहना है कि इन रेल्वे बुक स्टॉलवालों ने तो रेल्वे तक को पेमेंट नहीं किया है और मामला विवाद तक जा पहुंचा है। अब सवाल ये उठते हैं कि-
(1) क्या रेल प्रशासन कभी इन स्टॉलों का औचक परीक्षण कर यह जानने की कोशिश भी करता है कि इन स्टॉलों के जरिए देश की नई पीढ़ी को किस स्तर का साहित्य परोसा जा रहा है।
(2) क्या रेल मंत्रालय की राजभाषा सलाहकार समिति ने इन बुक स्टॉलों के नियंत्रण के लिए कुछ नियंत्रण-नियामक बनाए हैं। या उसकी नजर में कुरकुरे बेचना और किताबें बेचना एक ही श्रेणी का कारोबार है।
(3) क्या उन्हें इस बात की जानकारी है कि बुक स्टॉलों की स्थापना का मूल उद्देश्य यात्रियों के जरिए देश में अच्छे साहित्य का प्रचार-प्रसार करना है न कि उत्तेजक साहित्य बेचकर पैसे कमाना।
(4) क्या इन बुक स्टॉलों पर साहित्यिक पुस्तकें रखने का कोई संख्या-प्रतिशत मंत्रालय ने तय किया है। या फिर इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर फैसला लेने का अधिकार रेलमंत्रालय ने  इन स्टॉल मालिकों पर ही छोड़ दिया है।
(5) स्टॉल मालिकों और पुस्तक-प्रकाशकों के विवाद की जानकारी क्या रेल मंत्रालय को है। अगर है तो उसने पुस्तकों की निर्बाध सप्लाई के लिए क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था की है। या वो इसे महज एक महत्वहीन मुद्दा मानता है।

एतदर्थ,महोदय आपसे निवेदन है कि आप तत्काल प्रभाव से इस स्थिति की जानकारी मंगवाकर वस्तु स्थिति का आकलन करें और इस समस्या के समाधान के लिए जल्द-से-जल्द आवश्यक कार्रवाई कर हम सभी साहित्य प्रेमियों को अनुगृहीत करें।
समस्त आस्थाओं एवं विश्वास के साथ
सादर..
पंडित सुरेश नीरव
राष्ट्रीय अध्यक्ष

कार्रवाई के निवेदन के लिए हस्ताक्षर-
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