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Wednesday, May 15, 2013

 
बृहद भरत चरित्र महाकाव्य 


         टीका सहित 

         पृष्ठ -7 २ ०

महाकाव्य से कुछ प्रसंग आपके दर्शनार्थ -

मरता न पुत्र   तात अगारी। बहती सरयू  शुचि पय  धारी।

यह संज्ञान अवध संयोगा। सकल जगत में हर्षित लोगा।

तंहि  हुआ भरत प्रादुर्भावा।  कुल तिरेसठवां जग सिहावा।

श्रद्धा भक्ति  नेह संज्ञाना। अवाध   गति  वारीस  समाना।

धर्म धीर रत कुसुम निहारा। जीवन   मधुकर  है   संसारा।

सह्रदय भाव भरत ने पाया। बचपन माहि सरल गुण छाया।
    
परहित लसा  गूढ़  संज्ञाना। बाँधी  गाँठ  भरत    दिनमाना .


प्रस्तुति-

 योगेश






 
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