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Thursday, May 2, 2013

सदाबहार शायर सुरेश नीरव


pandit suresh neerav(poet-writer and journalist)

एक सदाबहार शायर हैं सुरेश नीरव
डॉक्टर के.एल. ज़ाकिर
कश्मीरी लाल ज़ाकिर
सुरेश नीरव इतने ख़ूबसूरत आदमी हैं, इतने ख़ूबसूरत शायर हैं और जो इतनी ख़ूबसूरत बातें करते हैं कि उनके बारे में लिखना तो क्या उन पर मर-मिटने को जी चाहता है। इनकी शाइरी इतनी प्यारी और ज़िंदगीबख़्श होती है कि उसे सुनकर मुर्दे भी जागकर क़हक़हे लगाने लगते हैं। इनकी शायरी का कमाल यह है कि यह सदाबहार है। आप इसे किसी मौसम में,किसी वक़्त और किसी माहौल में सुनिए,आपको उतना ही लुत्फ़ आएगा। मेरी नज़र में अच्छी शायरी की यही पहचान है। जिस तरह इनकी शख़्सियत खुली हवाओं की तरह तरोताज़ा है उससे कहीं ज़्यादा इनकी शायरी राहत देनेवाली है। वे इतने नर्म मिज़ाज है कि लगता है कि अपनी बीवी से भी कभी इनका झगड़ा नहीं होता होगा।
यह लगभग छह साल पुरानी बात है,जब में चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का चेयरमैन था।  तब एक मीटिंग में फैसला लिया गया था कि 01 अप्रैल को महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया जाए। यह फैसला इसलिए भी अच्छा था कि पहली अप्रैल का दिन जोकि फूल्स डे होता है,इसमें बजाय संजीदा बातें करने के,संजीदा शाइरी सुनने के,दिल को लुभानेवाली,हल्की बातें की जाएं और हल्की-फुल्की शायरी का लुत्फ़ लिया जाए। मैंने अपने कुछ दोस्तों से बात की तो उन्होंने कहा कि आप सुरेश नीरव के साथ सलाह कीजिए और वही आपको बता सकेंगे कि इस फंक्शन में किन-किन कवियों और शायरों को बुलाया जाए। इस तरह से 01 अप्रैल 1994 को चंडीगढ़ की लोअरवैली में हमने महामूर्ख सम्मेलन का पहला आयोजन किया। इस फंक्शन में क़रीब दस हज़ार लोग सुननेवाले आए और इस फंक्शन को सुरेश नीरव ने बख़ूबी कंडक्ट किया। हमने पहली बात तो यह की कि इस फंक्शन में किसी शख़स को चीफगैस्ट के तौर पर नहीं बुलाया बल्कि हमने एक बड़े सीधे-सादे और मासूम से गधे को सजाकर उसे चीफ़गैस्ट के तौर पर सुननेवालों की इतनी भीड़ के सामने पेश कर दिया। यूं समझिए कि कविसम्मेलन शुरू होने से पहले ही हमारे फंक्शन की धाक़ जम गई। चुनांचे हर साल,पहली अप्रैल को महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया जाने लगा। और साहित्य अकादमी चंडीगढ़ की यह प्रथा उस वक़्त खत्म हुई जब मैंने चेअरमैनशिप छोड़ी। दो-तीन वर्षों तक तो लोग मुझे हर साल पहली अप्रैल से हफ़्ता-दस दिन पहले ही पूछने लगते थे मूर्ख सम्मेलन कहां हो रहा है और इसमें कौन-कौन से कवि और शायर शामिल हो रहे हैं? मुझे इस बात का फ़क्र है कि हिंदुस्तान का बड़े-से-बड़ा हास्यकवि और मज़ाहिया शायर,चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की स्टेज पर आता रहा है। और लोगों को पहली अप्रैल के दिन ख़ूबसूरत-से-ख़ूबसूरत कविताएं और शेर सुनाता रहा है। महामूर्ख सम्मेलन को कामयाब बनाने में और इसमें चार चांद लगाने में सुरेश नीरव का अहम रोल रहा है। पहले फंक्शन के बाद से ही सुरेश नीरव मेरे बहुत ही प्यारे दोस्त बन गए और जब भी कहीं मैंने उन्हें आने की दावत दी उन्होंने वह फौरन कबूल की। यह चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का बहुत बड़ा कारनामा है कि उन हास्य कवियों का जिनका कि मैंने जिक्र किया है हरियाणा,पंजाब और हिमाचल,जम्मी-कश्मीर और चंडीगढ़ को सुनने का मौका दिया और हिंदुस्तान के इतने बड़े कवियों और शायरों को उन तक पहुंचाया। दो एक बार तो ऐसा भी हुआ कि इसमें पाकिस्तान के कुछ मज़ाहिया शायर भी शामिल हुए। जिन कवियों-शाइरों ने इन कार्यक्रमों में शिरकत की उनमे मुझे जो नाम याद आते हैं उनमें- अल्हड़ बीकानेरी,अशोक चक्रधर, ओमप्रकाश आदित्य, सुरेन्द्र शर्मा,हुल्लड़ मुरादाबादी, डॉक्टर सरोजनी प्रीतम, प्रकाश प्रलय,सूर्यकुमार पांडे,डॉक्टर रेखा व्यास,आदिल लखनवी,पॉपुलर मेरठी,दिलकश आफ़रीदी,सागर खय्यामी,चन्न ननकानवी,हरभजन सिंह हलवाई,प्रकाश साथी,तारासिंह कामल,सरदार मनजीत सिंह,डॉक्टर पूर्णिमा पूनम,सत्यदेव शास्त्री भौंपू और प्रोफेसर अख़तर बानो उल्लेखनीय हैं। सुरेश नीरव अपनी कविताओं की और ग़ज़लों की नई किताब लेकर हमारे सामने आ रहे हैं, मुझे इस बात का फख़्र है कि मैं अपने अजीज़ दोस्त के बारे में कुछ अल्फाज़ कह रहा हूं। यह उनकी मेहरबानी है कि उन्होंने मुझे उनके बारे में कुछ पंक्तियां लिखने का मौक़ा दिया और मुझे भी अपने बहुत बड़े खानदान में शामिल कर लिया। मैं अब चाहूंगा कि कि सुरेश नीरव की इस किताब में से कुछ कविताओं के नमूने आपको पेश करूं ताकि आप भी उन कविताओं से उतना ही लुत्फ़ उठा सकें जितना मैंने उठाया है-
बचपन से मेरा डेरा है कोशिशों के घर में
मंज़िल मिली है मुझको ख़ुद राह में मचल के
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कल मिनिस्टरजी ने फोड़ा पुल पे जाके नारियल
चोट काफी थी यही पुल को बिखरने के लिए
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चबा के सूबे को नेताजी ब्रेकफास्ट करें
डिनर में पूरे वतन को डकार लेते हैं
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फसल कामयाबी की चरते रहेंगे
ख़ुशामद गधों की जो करते रहेंगे
था बेहतर उसूलों की चर्चा न करते
अब आंखों से आंसू ही झरते रहेंगे
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बगल में महिला कॉलेज के जो अपना घर बना होता
निगाहों को बड़ा दिलक़श नज़ारा मिल गया होता
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लगा है शौक़ पढ़ने का हमें यारो बुढ़ापे में
बंधी भैंसे मदरसे में तो पढ़ने हम कहां जाएं?
00
रिश्ता किसी ने ख़ूब निभाया है प्यार का
तोहफे में उसने भेजा है मच्छर बुख़ार का
मैं अब और कुछ कहने की बजाय सुरेश नीरव को आपके हवाले करता हूं। आप इनकी कविताओं के द्वारा उनसे स्वयं बातचीत कीजिए और मेरी उस राय की पुष्टि कीजिए जो मैंने उनके बारे में बनाई हैं।
 मकान नंबर-367, सैक्टर-44ए,चंडीगढ़                  -कश्मीरी लाल ज़ाकिर
                                              सचिवःउर्दू अकादमी(हरियाणा)

(मज़ामिलेनियम ग़ज़ल संग्रह सेःसन् 2000)
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