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Friday, September 13, 2013

नेपाल की वादियों में



लम्हें जो गुजरे नेपाल में...
          जहां दूरियां मिलती हैं...नज़दीकियों के साथ
           पंडित सुरेश नीरव

चंगुनारायण मंदिर जहां भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेष शैया पर लेटे हैं।

अभी 5 सितंबर को तीन दिनी आवास पर काठमांडू जाना हुआ। एलाइंस क्लब्स इटरनेशनल का आयोजन था। वेसे नेपाल की ये मेरी पांचवी-छठी यात्रा थी। मगर हर बार नेपाल मुझे एक अलग ही ढ़ंग से आकर्षित करता है। उसका एक बड़ा कारण तो यह है कि जो भारत की तुलना में बहुत छोटा देश है, मगर अपने इतिहास में यह ही एक राष्ट्र है। अंग्रेजों के राज्य में जिसके लिए कहा जाता रहा है कि उनके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था नेपाल तब भी एक स्वतंत्र देश था और यह देश ही किसी भी गैर शासक का झंडा नेपाल पर कभी नहीं लहराया। नेपाल बौद्धों का भी प्रभाव क्षेत्र रहा मगर आज भी यहां की 81 प्रतिशत जनता हिंदू है। जो भारत से भी ज्यादा है। और दुनिया की सबसे ऊंची चौदह हिमश्रंखलाओं में से कुल जमा आठ तो अकेले नेपाल में ही हैं। जिसमें सगरमाथा(एवरेस्ट) जो दुनिया का सर्वोच्च शिखर है वह भी नेपाल में ही है। यहां आकर अपनी अस्मिता,आजादी और ऊंचेपन के बोध से मैं हमेशा भर जाता हूं। ऐसा माना जाता है कि महामुनि "ने"  ने यहीं एक गुफा में बैठकर तपस्या की थी। नेपाल नाम "ने" ऋषि की गुफा(पाल) का ही द्योतक है। आज का जो नेपाल है वह अठारवीं सदी में हुए गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह के विशाल राज्य का ही आंशिक भूभाग है। जैसे उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है वैसे ही नेपाल को भी देवताओं का घर कहा जाता है। रंगों,बर्फ से ढकी पर्वतमालाओं और प्रकृति की अनुकंपा से सजा-संवरा खूबसूरत नेपाल अपनी विविधताओं के कारण बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेता है। यकीनन भारत के उत्तर में बसा नेपाल एक बेहद खूबसूरत देश है। धार्मिक प्रवृति के लोगों के लिए जहां नेपाल में अनेक मंदिर और बौद्ध स्तूप हैं तो वहीं लोगों के लिए यहां रिवर राफ्टिंग, रॉक क्लाइमिंग, जंगल सफारी और स्कीइंग के भी इंतजाम हैं। काठमांड से करीब 5 किमी. उत्तर-पूर्व में भागमती नदी के किनारे भगवान शिव का आठवां ज्योतिर्लिंग कहा जानेवाला विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ का मंदिर है। जो हिंदुओं का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त पशुपतिनाथ जी एक बार श्रद्धापूर्वक दर्शन कर लेता है उसे भोले बाबा दो बार और अपने पास बुलाते हैं। हमारे साथ तो यह हुआ कि चार दिन के प्रवास में ही हमें  अनायास ही उनके तीन बार दर्शन करने का सौभाग्य और सुविधा उपलब्ध हुई। तीन बार पहले भी मैं उनके दर्शन कर चुका हूं। इसी मंदिर प्रांगण में कई और भी छोटे-छोटे मंदिर बने हुए हैं। एक और विश्वप्रसिद्ध मंदर है- चंगुनारायण मंदिर। चौथी शताब्दी में बना यह विष्णु मंदिर काठमांडू का सबसे पुराना विष्णु मंदिर है। पैगोडा शैली में बने आज हम जिस मंदिर को देखते हैं वह सन्-1702 में दुबारा बनाया गया था। क्योंकि भीषण आग में पहले का बना  हुआ मंदिर जलकर नष्ट हो गया था। यहां क्षीर सागर में नागशैया पर लेटे विष्णु भगवान की प्रतिमा अद्वितीय है। इस चंगुनारायण मंदिर के विशाल प्रांगण में कई रुद्रक्ष के वृक्ष भी लगे हैं। इस मंदिर का महत्व इस बात से आसानी से लगाया जा सकता है कि यूनेस्को ने इस मंदिर को विश्वधरोहर की सूची में शामिल किया है। इसी क्रम में यूनेस्को की आठ सांस्कृतिक विश् धरोहरों में से एक काठमांड दरबार भी है। इसे भक्तपुर दरबार स्कवेयर  भी कहते हैं। इस भक्तपुर दरबार स्कवेयर का निर्माण काल सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी का समय है। स्वर्ण द्वार, जो दरबार स्क्वयर का प्रवेश द्वार है,, सचमुच बहुत ही आकर्षक है। कीमती पत्थरों से सज्जित इस द्वार के ऊपर गरुढ़ और काली की प्रतिमा बनी हैं। यह भक्तपुर दरबार स्कवेयर पारंपरिक नेवाड़, पैगोडा शैली में बने बहुत सारे मंदिरों को अपने विराट आंगन में समेटे हुए है। हनुमान ड्योढ़ी में बना क्वारी कन्या का मंदिर भी अभूतपूर्व है। आज भी यहां एक क्वांरी कन्या की देवी के रूप में पूजा की जाती है। और हज़ारों लोग उस कन्यादेवी के दर्शन के लिए लालायित रहते हैं। हमें और हमारे कई साथियों को इस दैवीयकन्या के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  मैं सोचने लगता हूं कि एक तरफ एक देश में कन्या की देवी के रुप में पूजा और एक तरफ हमारे देश में आश्रमों तक में कन्या का यौन उत्पीड़न हमें सोचने पर मजबूर करता है कि नवरात्रों को धूमधाम से मनानेवाला हमारा देश,कंजक में कन्या के पांव पूजनेवाला हमारा देश आज अपसंस्कृति के किस मुहाने पर खड़ा है? दरबार स्क्वेयर का बाजार सैलानियों को खरीदफरोख्त़ के लिए खूब ललचाता है। तमाम कलाकृतियों और आधुनिक सामान से लैस यह बाजार नेपाल का कनॉटप्लेस है। काठमांडू के मध्य में 14वीं शताब्दी में बना एक विशाल बोधनाथ स्तूप है। यह नेपाल का सबसे बड़ा बोद्ध स्तूप है। जहां हमने  तमाम बोद्ध भक्तों को पूजा करते हुए देखा। एक साधक बौद्ध स्तूप देखने आए तमाम भक्तों की भीड़ से अलग एक पेड़ के नीचे अपनी आंखों में पट्टी बांधकर ढपली बजा-बजाकर   धीरे-धीरे कुछ मंत्रों को बोल रहा था। लोगों ने बताया कि ये सुबह से ही इस तरह से पूजा कर रहा है। कुछ आगे चलकर बौद्ध महिता भक्तों को देखा। जो स्तूप के सामने लगे दो लकड़ी के स्लीपरों पर हाथ में कपड़ा बांधकर दंडवत देती हुई फिसलती थीं, फिर धीरे से खड़ी होती थी और फिर कंधे के ऊपर अपने दोनों हाथों को लेजाकर नमस्कार की मुद्रा में खड़ी हो जाती और फिर दंडवत देने को लकड़ी के स्लीपर पर साष्टांग दंडवत की मुद्रा में झुक जातीं। चीन के हमले के बाद तिब्बत के तमाम शरणार्थी यहां आकर बस गए हैं। 
तिब्बतियों के मामले में इसकी तुलना भारत के हिमाचल में स्थित धरमशाला से की जा सकती है जहां दलाई लामा रहते हैं। बोद्ध धरम और हिंदू धर्म का एक संतुलित समन्वय नेपाल में देखने को मिलता है। इन तमाम धार्मिक मान्यताओं के बावजूद काठमांडू में द्यूतक्रीड़ा के शौकीन लोगों के लिए अपना शौक पूरा करने के लिए तमाम कैसिनो भी हैं। जहां दिन-रात सैलानी जूआ खेल सकते हैं। काठमांडू से 32 कि.मी. पूर्व भक्तपुर जिले में समुद्रतल से 2,195 मीटर की ऊंचाई पर एक और बेहद खूबसूरत जगह है-नगरकोट। काठमांडू घाटी की ये एक मात्र ऐसी जगह है जहां से आप सूर्योदय और सूर्यास्त का न केवल दिल को लुभानेवाला नज़ारा देख सकते हैं बल्कि यहां से काठमांडू घाटी और एवरेस्ट के साथ-साथ बर्फ से लदी तमाम और हिमालयी पर्वतश्रंखलाओं का भरपूर आनंद ले सकते हैं। यहां हमलावर दुश्मनों की चौकसी के लिए कभी एक किला भी बनाया गया था जो आजकल पर्यटकों के लिए एक मनपसंद आरामगाह बना हुआ है। इसकी छत पर खड़े होकर डूबते सूरज को देखना अपने आप में एक अनोखा तजुर्बा है। अगर आप आप के पास समय है तो काठमांडू से पोखरा देखने जरूर जाना चाहिए। काठमांडू से दोसौ कि.मी.पश्चिम की तरफ है तीस मील के घेरे में धौलागिरि,अन्नपूर्णा और मनासलू-जैसे दुनिया के तीन बड़े पर्वत शिखरों को अपने में समेटे बेहद खूबसूरत पर्यटक स्थल-पोखरा। सैलानियों का एक बेहद मनपसंद ठिकाना। मीलों दूर तक जमीन पर फैली कच्च हरी घास की निर्मल हरियाली और आकाश को चूमती बदन पर बर्फ़ का साफ-शफ्फ़ाक़ शॉल लपेटे पर्वत श्रंखलाएं। यहां आकर आदमी एक बार तो  यकबयक उस दुनिया में चहलकदमी करने लगता है जिसे किताबों में जन्नत कहा जाता है। कुल मिलाकर नेपाल  सांस्कृतिक दृष्टि से एक ऐसा देश है जो भारत से बाहर भी हमें भारत में होने का अहसास कराता है। जहां की राष्ट्र भाषा नेपाली होने के बावजूद यहां कार,बस और मोटर साइकल पर शतप्रतिशत नंबर प्लेट आज भी हिंदी में ही लिखी मिलती हैं। और दुकानों के साइनबोर्ड भी ज्यादातर हिंदी में ही लिखे होते हैं। तीज और छठ का त्योहार यहां भी भारत की ही तरह धूमधाम से मनया जाता है। और यहां के टीवी पर भारत के ज़ी टीवी, आजतक, सब टीवी-जैसे चैनल आपको हर पल भारत से दूर होकर भी भारत से जोड़े रहते हैं। यहां का गाइड भी शाब फिर नेपाल आइएगा, कहकर परदेस में भी हमें हमसे ही मिला देता है।
नगरकोट में सुरेश नीरव,रजनीकांत राजू और राकेश पांडेय।

-         आई-204 गोविंदपुरम,गाजियाबाद

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