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Wednesday, March 16, 2011

एक बार फिर कही चिर जीवित,चिर नूतन

पिता जी को सादर समर्पित एक चिंतन -------
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ये सुचिंतित सार्थक विद्रोह नहीं
चेतना की उदिग्निता मात्र है !
ये विश्व व्यापी आक्रोश नहीं
विक्षिप्त भारती परिवेश है!
भावनाओं के विक्षिप्त घुन्घुरो के बीच
कही जब ये बेहया शब्द
टकराते है
मूल्य हीनता , दिशा विहीनता , राष्टीय चरित्र को
दोहराते है !
ये सत्य है -----
आक्रोश
एक बार फिर कही चिर जीवित,चिर नूतन
सा हो जाता है !
ला फेकता है
अतीत के गर्त में
अतीत भी चटक सा जाता है !
ये कौन है जो चिघाड रहा है
वर्ग संघर्ष से सामान्य इक्षा
पा रहा है
अब तो मार्क्स भी नहीं संघर्ष
बताने के लिए
रूसो भी नहीं इक्षा
खोजने के लिए -------
फिर चिंतन की नई गहराई में
बलखाती तरुणायी में
सुनने में आता है
अभी -अभी एक मौत
और हुई !-
-रविन्द्र शुक्ला