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Sunday, March 6, 2011

बाबा रामदेव राजनीति सरल नहीं है

बाबा रामदेव ने कल रामलीला मैदान में शानदार मीटिंग की। उस मीटिंग में अनेक स्वनामधन्य लोग जैसे संघ के गंभीर विचारक गोविन्दाचार्य,भाजपा नेता बलबीर पुंज, नामी वकील रामजेठमलानी,सुब्रह्मण्यम स्वामी,स्वामी अग्निवेश,किरण बेदी आदि मौजूद थे। बाबा रामदेव ने यह मीटिंग किसी योगाभ्यास के लिए नहीं बुलायी थी। यह विशुद्ध राजनीतिक मीटिंग थी। इस मीटिंग में बाबा रामदेव के अलावा अनेक लोगों ने अपने विचार रखे। यह मीटिंग कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह बाबा रामदेव की राजनीतिक आकांक्षाओं को साकार करने वाली मीटिंग थी।
एक नागरिक के नाते बाबा में राजनीतिक आकांक्षाएं पैदा हुई हैं यह संतसमाज और योगियों के लिए अशुभ संकेत है। बाबा का समाज में सम्मान है और सब लोग उन्हें श्रद्धा की नजर से देखते हैं।उनके बताए योगमार्ग पर लाखों लोग आज भी चल रहे हैं। योग की ब्रॉण्डिंग करने में बाबा की बाजार रणनीति सफल रही है। मुश्किल यह है कि जिस भाव और श्रद्धा से बाबा को योग में ग्रहण किया गया है राजनीति में उसी श्रद्धा से ग्रहण नहीं किया जाएगा।
बाबा रामदेव को यह भ्रम है कि वे जितने आसानी से योग के लिए लिए लोगों को आकर्षित करने में सफल रहे हैं उसी गति से राजनीतिक एजेण्डे पर भी सक्रिय कर लेंगे । बाबा राजनीतिक तौर पर जिन लोगों से बंधे हैं और जिन लोगों को लेकर वे राजनीतिक मंचों से भाषण दे रहे हैं उनमें अनेक किस्म के स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता और नेता हैं। किरणबेदी से लेकर स्वामी अग्निवेश आदि इन सबकी सीमित राजनीतिक अपील है और ये लोग दलीय राजनीति में विश्वास नहीं करते। वरना अपना दल बनाते।
भारत में लोकतंत्र दलीय राजनीति से बंधा है और दलीय राजनीति कोई करिश्माई चीज नहीं है। राजनीति रैली की भीड़ इकट्ठा करने की कला नहीं है,भाषणकला नहीं है। दलीय राजनीति की समूची प्रक्रिया बेहद जटिल और अंतर्विरोधी है। मसलन योग सिखाते हुए बाबा रामदेव को धन मिलता है। जो सीखना चाहता है उसे पैसा देना होता है। राजनीति में बाबा को रैली करनी है ,अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने हैं,प्रचार करना है तो उन्हें अपनी गाँठ से धन खर्च करना होगा अथवा किसी सेठ-साहूकार-तस्कर-माफिया-भ्रष्ट पूंजीपति से मांगना होगा और कहना होगा कि मेरी मदद करो। आम जनता से पैसा जुगाडना और राजनीति करना यह आज के जमाने की कीमती राजनीति में संभव नहीं है।
बाबा जानते हैं राजनीति का मतलब राजनीति है, फिर और कोई गोरखधंधा नहीं चल सकता। राजनीति टाइमखाऊ और पैसाखाऊ है। योग में बाबा को जो आनंद मिलता होगा उसका सहस्रांश आनंद उन्हें राजनीति में नहीं मिलेगा। अभी से ही बाबा ने राजनीति के चक्कर में शंकर की बारात एकत्रित करनी आरंभ कर दी है । मसलन दिल्ली में कल जो रैली बाबा ने की उसमें मंच पर बैठे जितने भी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे उनकी आम जनता में कितनी राजनीतिक साख है यह बाबा अच्छी तरह जानते हैं। इनमें कोई भी जनता के समर्थन से चुनकर विधानसभा-लोकसभा तक नहीं जा सकता। रामजेठमलानी- सुब्रह्मण्यम स्वामी की एक-एक आदमी की पार्टी है नाममात्र की। बाकी दो भाजपानेता मंच पर थे जिनका कोई जनाधार नहीं है। किरनबेदी और स्वामी अग्निवेश कहीं पर नगरपालिका का चुनाव भी नहीं जीत सकते। यही हाल अन्य लोगों का है। बाबा रामदेव आज अपनी सारी चमक,प्रतिष्ठा और भव्यता के बाबजूद यदि अपने मंच पर इस तरह के जनाधारविहीन नेताओं के साथ दिख रहे हैं तो भविष्य तय है कि कैसा होगा। कहने का यह अर्थ नहीं है कि रामजेठमलानी, अग्निवेश,सुब्रह्मण्यम स्वामी आदि जो लोग मंच पर बैठे थे उनकी कोई प्रप्तिष्ठा नहीं है। निश्चित रूप से ये लोग अपने सीमित दायरे में यशस्वी लोग हैं। लेकिन राजनीति में ये जनाधाररहित नेता हैं। राजनीति में मात्र साख से काम नहीं चलता वहां जनाधार होना चाहिए।
बाबा रामदेव की एक और मुश्किल है वे राजनीति करना चाहते हैं साथ ही योग-भोग और राजनीति का संगम बनाना चाहते हैं। राजनीति संयासियों-योगियों का काम नहीं है । यह एक खास किस्म का सत्ताभोगी कला,शास्त्र,और सिस्टम है।बाबा को भोग से घृणा है फिर वे राजनीति में क्यों जाना चाहते हैं ? राजनीति लंगोटधारियों का खेल नहीं है। राजनीति उन लोगों का काम भी नहीं जो घर फूंक तमाशा देखते हों। राजनीति एक उद्योग है।एक सिस्टम है। जिस तरह योग एक सिस्टम है।
बाबा योग के सिस्टम से राजनीति के सिस्टम में आना चाहते हैं तो इन्हें अपना मेकअप बदलना होगा। वे योगी के मेकअप और योग के सिस्टम से राजनीति के सिस्टम में नहीं आ सकते। उन्हें सिस्टम बदलना होगा। राजनीतिक सिस्टम की मांग है कि अब योगाश्रम खोलने की बजाय राजनीतिक दल के ऑफिस खोलें। अपने कार्यकर्ताओं को शरीरविद्या और योगविद्या की बजाय दैनंदिन राजनीतिक फजीहतों में उलझाएं। योगचर्चा की बजाय राजनीतिक चर्चाएं करें। स्वास्थ्य की बजाय अन्य राजनीतिक सवालों पर प्रवचन दें। इससे बाबा के अब तक के कामों का अवमूल्यन होगा। बाबा नहीं जानते राजनीति में हर चीज का अवमूल्यन होता है। व्यक्तित्व,मान-प्रतिष्ठा,पैसा,संगठन आदि सबका अवमूल्यन होता है।
यह सच है राजनीति और सत्ता की चमक बड़ी जबर्दस्त होती है लेकिन राजनीति में एक दोष है अवमूल्यन का। इस अवमूल्यन के वायरस का सभी शिकार होते हैं वे चाहे जिस दल के हों,जितने भी ताकतवर हों। राजनीति में निर्माण और अवमूल्यन स्वाभाविक प्रक्रिया है। बाबा रामदेव की राजनीति के प्रति बढ़ती ललक इस बात का संकेत है कि वे अब अवसान की ओर जाना चाहते हैं। वैसे योग का उनका कारोबार अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुका है। वे योग से जितना निचोड़ सकते थे उसका अधिकतम निचोड चुके हैं। जितने योगी बना सकते थे उतने बना चुके हैं।
आज बाबा रामदेव का योग ब्राण्ड सबसे पापुलर ब्राँण्ड है और इसकी चमक योग तक ही अपील करती है। योग की आंतरिक समस्याएं कई हैं,मसलन् योग में राजनीति का घालमेल करने से फासिज्म पैदा होता है। बाबा रामदेव जानते हैं या जानबूझकर अनजान बन रहे हैं,योग वस्तुतः धर्म है और धर्म और राजनीति का घालमेल अंततः फासिज्म के जिन्न को जन्म दे सकता है। भारत 1980 के बाद पैदा हुए राममंदिर के नाम से पैदा हुए खतरनाक राजनीतिक खेल को देख चुका है।
बाबा रामदेव को लगता है कि वे भ्रष्टाचार से परेशान हैं तो वे योग को कुछ सालों के लिए विराम दें और खुलकर राजनीति करें। राजनेता बनें,कुर्ता-पाजामा पहनें,पेंट-शर्ट पहनें, अपना ड्रेसकोड बदलें। जिस तरह योगियों का अपना ड्रेसकोड है,संतों का है,पुजारियों का है,उसी तरह राजनीतिज्ञों का भी है। बाबा अपना ड्रेसकोड बदलें। संत जब तक संत के ड्रेसकोड में है वह धार्मिक व्यक्ति है और यदि वह धर्म और राजनीति में घालमेल करना चाहता है तो यह स्वीकार्य नहीं है । राममंदिर आंदोलन की विफलता सामने है। भाजपा ने संतों का इस्तेमाल किया आडवाणी जी संत नहीं बन गए। वे रामभक्त राजनीतिज्ञ बने रहे,रामभक्त संत नहीं बने।
संतों की पूंजी पर भाजपा के अटलबिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री के पद पर पहुँचे थे लेकिन भाजपा ने अपने सांसदों में बमुश्किल 10 प्रतिशत सीटें भी संतों को नहीं दी थीं। बाद में जो संत भाजपा से चुने गए उनका इतिहास सुखद नहीं रहा है। संतों की ताकत से चलने वाले आंदोलन,जिसका पीछे से संचालन आरएसएस कर रहा था, का हश्र सामने है।
एनडीए की सरकार बनने पर राममंदिर एजेण्डा नहीं था। यह संतों के साथ भाजपा का विश्वासघात था। भाजपानेता जानते थे राममंदिर एजेण्डा रहेगा तो केन्द्र सरकार नहीं बना सकते, अटलजी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते और फिर क्या था रामभक्तों ने आनन-फानन में राममंदिर को तीन चुल्लू पानी भी नहीं दिया और सरकार में जा बैठे। संतसमाज का इतना बडा निरादर पहले कभी किसी दल ने नहीं किया।
कायदे से भाजपा को अड़ जाना चाहिए था कि राममंदिर को हम अपने प्रधान लक्ष्य से नहीं हटाएंगे,लेकिन सत्ता सबसे कुत्ती चीज है उसे पाने के लिए राजनेता किसी भी नरक में जाने को तैयार रहते हैं और एनडीए का तथाकथित मोर्चा तब ही बना जब राममंदिर के सवाल को भाजपा ने छोड़ दिया। संतों के राजनीतिक पराभव और भाजपा के राजनीतिक उत्थान के बीच यही अंतर्क्रिया है। संतों ने शंख बजाए भाजपा ने सत्ता पायी।
संदेह हो रहा है कि कहीं बाबा रामदेव नए रूप में संतसमाज को फिर से राजनीतिक गोलबंदी करके एकजुट करके भाजपा को सत्ता पर बिठाने की रणनीतियों पर तो नहीं चल रहे ?
बाबा रामदेव को जितनी भ्रष्टाचार से नफरत है उन्हें विभिन्न दलों और खासकर भाजपा के बारे में अपने विचार और रिश्ते को साफ करना चाहिए। मसलन बाबा ने कांग्रेस को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार ठहराया है और वे बार-बार उसके खिलाफ बोल रहे हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में कुछ महिने पहले बाबा आए थे,कोलकाता में उन्होंने खुलेआम कहा वे ममता बनर्जी के लिए वोट मांगेगे। बाबा जानते हैं कि उनके बयान का अर्थ है कि कांग्रेस के लिए ही वोट मांगेगे। किनके खिलाफ वोट मानेंगे ? बाबा वाममोर्चे के खिलाफ वोट मांगेंगे। वे जानते हैं वाममोर्चा कालेधन के खिलाफ संघर्ष तब से कर रहा है जब बाबा का योगी के रूप में जन्म नहीं हुआ था। यदि बाबा अपने विचारों पर अडिग हैं और उन्हें भ्रष्टनेताओं से चिड़ है तो वे बताएं कि वामशासन में 35 सालों में किस मंत्री या मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप आए ? इनदिनों वाममोर्चा अपनी अकुशलता और नाकामी की वजह से जनता में अलगाव झेल रहा है।
एक अन्य सवाल इठता है कि बाबा गेरूआ वस्त्र पहनकर,संत के बाने के साथ ही राजनीति क्यों करना चाहते हैं ?क्या इससे वोट ज्यादा मिलेंगे ? जी नहीं,रामराज्य परिषद नामक राजनीतिक दल का पतन भारत देख चुका है। किसी ने भी उस पार्टी को गंभीरता से नहीं लिया जबकि उसके पास करपात्री महाराज जैसा शानदार संत और विद्वान था।
संत का मार्ग राजनीति की ओर नहीं मोक्ष की ओर जाता है। बाबा रामदेव एक नयी मिसाल कायम करना चाहते हैं कि संतमार्ग को राजनीति की ओर ले जाना चाहते हैं। संत यदि राजनीति में जाते हैं यो यह संत के लिए अवैधमार्ग है। संत का वैध मार्ग राजनीति नहीं है। राजनीति में जो संत हैं वे संतई कम और गैर-संतई के धंधे ज्यादा कर रहे हैं। राजनीतिविज्ञान की भाषा में संत का राजनीति में आने का अर्थ धर्म का राजनीति में आना है और इससे राजनीति नहीं साम्प्रदायिकता यानी फासिज्म पैदा होता है।

Saturday, March 5, 2011

ये दिल्ली मेरी जान

भरी भीड़ में अकेले खड़े हैं मनमोहन
आज जयलोकमंगल के सदस्यों को पेश कर रहे हैं हम लिमटी खरे का एक लेख। तय है आपको पसंद आएगा।
हीरालाल पांडेय
कांग्रेस के अंदर अब यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि अब वक्त आ गया है और वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन को सेवानिवृत्ति ले लेनी चाहिए। मतलब साफ है कि इस साल देश को नया प्रधानमंत्री तो अगले साल देश को नया महामहिम राष्ट्रपति मिलने वाला है। ईमानदार छवि के धनी गैर राजनैतिक प्रधानमंत्री डाॅ.सिंह के दिन गिनती के ही बचे हैं। उधर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी फिलहाल बतौर प्रधानमंत्री अपनी ताजपोशी को तैयार नहीं हैं। राहुल के अलावा जिन नामों पर चर्चा संभव है उनमें प्रणव मुखर्जी, पलनिअप्पम चिदम्बरम और ए.के.अंटोनी के नाम प्रमुख हैं। इनमें अंटोनी के पीछे सोनिया का जबर्दस्त समर्थन हैं। लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार भी दबे पांव इस दौड़ में शामिल हैं। अगर दलित और महिला को प्रधानमंत्री बनाने की बात आती है तो मीरा कुमार का दावा सबसे अधिक पुख्ता हो जाता है। इस सबसे इतर चतुर सुजान राजा दिग्विजय सिंह भी बिसात बिछाने में लगे हैं, पर राजा के दांव समझना इन राजनेताओं के बस की बात नहीं।
साढ़े नौ दशक बाद लल्ला लाएगा ब्राम्हण दुल्हनिया
आजादी के बाद देश के खिवैया रहे नेहरू गांधी परिवार में एक संयोग 94 साल बाद बनने जा रहा है। मौका है इस परिवार की राजनैतिक तौर पर सक्रिय पांचवीं पीढ़ी के विवाह का। संजय गांधी के पुत्र वरूण गांधी की जीवन संगनी ब्राम्हण बाला बनने वाली है। इसके पहले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की 1916 में ब्राम्हण कुल की कमला नेहरू को अपनी अर्धांग्नी बनाया था। इसके बाद इंदिरा गांधी ने फिरोज गांधी से तो राजीव गांधी ने इटली मूल की सोनिया और स्व.संजय ने पंजाबी मेनका को अपना जीवन साथी चुना। इसके बाद वाली पीढ़ी में प्रियंका ने राबर्ट वढ़ेरा को चुन लिया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की नजरें भी विदेशी बाला पर ही होने की खबरें हैं। इन परिस्थितियों में वरूण गांधी द्वारा ब्राम्हण कन्या से विवाह रचाकर कांग्रेस के गांधीज को परेशानी में डाल दिया है। अब राहूुल की मजबूरी हो जाएगी कि वे भी ब्राम्हण कन्या के साथ ही स्वयंवर रचाएं। वैसे उत्तर प्रदेश के एक संसद सदस्य के परिवार में उनके विवाह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
किसानों के पैसों से चमक रहे माननीयों के कपड़े
देश भर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है भूमिपुत्र किसान को। किसानों के लिए सरकारें हर कुछ करने को आमदा होती है। किसानों के नाम पर राजनीति भी जमकर ही होती है। पिछले दिनों दिल्ली से इल्ली तक किसानों को सभी ने लूटा। हाल ही में छत्तीसगढ़ की आर्थिक अपराध शाखा के पास एक नए तरीके का अभिनव मामला प्रकाश में आया है, जिसकी चर्चा भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में भी हो रही है। बताया जाता है कि किसानों के लिए जिस रकम का प्रावधान किया गया था, उस राशि से माननीय वियाायकों और मंत्रियों के कपड़ों की चमक बरकरार रखने के लिए वाशिंग मशीन ही खरीद दी गईं। पहले 7550 रूपए प्रति मशीन के हिसाब से तीन लाख दो हजार की बाद में 5600 रूपए के हिसाब से तीन लाख 92 हजार की मशीने खरीदी गईं। किसानों के लिए सरकार ने छः लाख चोरानवे हजार का प्रावधान किया किन्तु अधिकारियों ने माननीयों के कपड़ों की चमक के लिए उसे खर्च कर दिया।
मंहगाई ने किया संसद की और रूख!
जी हां, यह सच है कि आसमान छूती मंहगाई ने अब देश की सबसे बड़ी पंचायत की ओर रूख कर दिया है। आपको यकीन नहीं हो रहा है न। जाईए, सांसदों के आवास के पास की केंटीन में जाकर कुछ खाईए तो सही। आपको पहले से ज्यादा किन्तु बाजार से काफी कम दरों पर भुगतान करना होगा। सांसदों को काफी के लिए चार रूपए, वेज बिरयानी बारह रूपए, चिकिन बिरयानी के लिए 51 रूपए का शगुन। हर मामले मंे दरें पचास फीसदी बढ़ा दी गईं हैं। आप सोच रहे होंगे कि आखिर माजरा क्या है? क्या माननीयों की केंटीन आजाद भारत के बाहर है, जी नहीं इस केंटीन में मिलने वाले खाने पर सरकार द्वारा सब्सीडी दी जाती है। अर्थात इसके अलावा शेष राशि का भुगतान सरकार द्वारा किया जाता है। और यह भुगतान होता है आम जनता से करों के माध्यम से वसूली गई राशि से। है न कमाल की बात। आम जनता की आवाज उठाने वाले आम जनता के पैसे पर किस कदर एश करते हैं, यह बात सिर्फ और सिर्फ भारत गणराज्य में ही देखने को मिल सकती है।
कानून का मजाक उड़ाते ‘माननीय‘
भारत गणराज्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां चुने हुए या पिछले दरवाजे से प्रवेश करने वाले सांसद या विधायक ही देश के कानून के साथ खिलवाड़ करते नजर आते हैं। जिन सांसदों या विधायकों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, वे खुलेआम सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिरकत करते नजर आते हैं, उन्हें पकड़ने के लिए पाबंद पुलिस ही उनकी देखसंभाल में लगी होती है। बीते दिनों मध्य प्रदेश के एक विधायक के बारे में भी इसी तरह की चर्चाएं दिल्ली स्थित ‘मध्य प्रदेश भवन‘ में चटखारे लेकर सुनाई गई। सुसनेर के भाजपा विधायक संतोष जोशी पर मोमिन बडोदिया थाने में धारा 323 और 506 का प्रकरण पंजीबद्ध है। वे दो माहों से फरार हैं। बावजूद इसके जोशी ने अपने क्षेत्र में पदयात्रा की। नियम कायदों को ताक पर रखने की हद तो तब हो गई जब फरार विधायक के कार्यक्रम में सूबे के निजाम शिवराज सिंह चैहान ने भी आमद दे दी। सीएम की वहां मौजूदगी के चलते पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों के सामने विधायक संतोष जोशी सीना तानकर मंच पर डटे रहे। कोई राह चलता होता तो पुलिस का अदना सा सिपाही भी उसे कालर पकड़कर हवालात में ले जाता पर यहां तो साहेब बहादुर ही सलाम ठोंक रहे थे।
जयंती ने कराई कांग्रेस की किरकिरी
कांग्रेस के प्रवक्ताओं की फौज में शामिल राज्य सभा सांसद जयंती नटराजन वैसे तो अपना अधिक समय चेन्नई में बिताने के लिए मशहूर हो चुकी हैं, पिछले दिनों संसद में उनकी अनुपस्थिति ने कांग्रेस को बुरी तरह शर्मसार किया। मसला यह था कि महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सत्तारूढ़ कांग्रेसनीत संप्रग की ओर से जनार्दन द्विवेदी के धन्यवाद प्रस्ताव के समर्थन में जब उपसभापति ने बार बार जयंती नटराजन का नाम पुकारा तब वे सीट से नदारत ही थीं। मौके की नजाकत को भांप उपसभापति ने सदन की कार्यवाही एक घंटा पहले ही स्थगित करना मुनासिब समझा। मजे की बात तो यह रही कि उस वक्त सदन में वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह स्वयं उपस्थित थे। बाद में पतासाजी पर ज्ञात हुआ कि नटराजन ने चर्चा में भाग लेने के बजाए उस वक्त गोधरा कांड पर मीडिया से मुखातिब होना उचित समझा।
. . . तो यह दांव लगाया चिरंजीवी ने
आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी फेक्टर की काट के तौर पर कांग्रेस ने प्रजाराज्यम पार्टी से विलय की खिचड़ी पका ही ली। लोग असमंजस में हैं कि आखिर दोनों ही को इससे क्या लाभ हुआ। कांग्र्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है चूंकि दक्षिण में चिरंजीवी का जलजला है इसलिए कांग्रेस उनकी लोकप्रियता को भुनाना चाह रही है। सूत्रों ने आगे कहा कि चिरंजीवी ने विलय के लिए केंद्र में मंत्री पद की शर्त रखी थी। चूंकि चिरंजीवी लोक या राज्यसभा में नहीं हैं अतः उन्हें चुनवाने की जवाबदेही कांग्रेस के सर ही आती। बाद में राजमाता सोनिया गांधी के एक रणनीतिकार ने उन्हें मशविरा दिया कि अगर चिरंजीवी को उपमुख्यमंत्री बना दिया जाए तो उचित होगा। फिर क्या था चिरंजीवी के सामने यह जलेबी लटका दी गई। चिरंजीवी खुद को लाल बत्ती में बैठकर घूमने का सपना देखने लगे और हो गया प्रजाराज्यम का कांग्रेस में विलय।
‘खेद पत्र‘ ने बांटा भाजपा को
पाकिस्तान के कायदे आजम जिन्ना की तारीफों में कशीदे पढ़ने के बाद यह दूसरा मौका होगा जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी की भूमिका पर पार्टी के अंदर सवाल उठने लगे हों। मामला कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को काले धन और विदेशी बैंक खातों के संबंध में लिखे गए खेद प्रकट करने का खत से जुड़ा हुआ है। भाजपा का एक धड़ा इसे उच्च आदर्श की राजनीति का घोतक तो दूसरा राजनैतिक तौर पर गैरजरूरी कदम निरूपित कर रहा है। लोकसभा में पार्टी के उपनेता गोपी नाथ मुंडे का कहना है कि यह सोनिया के लिए क्लीन चिट नहीं है। मामले की जांच चल रही है, जब तक जांच पूरी नहीं होती तब तक यह कहना मुश्किल है कि किसका खाता है और किसका नहीं। अंदरखाते से जो खबरें छन छन कर बाहर आ रही हैं उन पर अगर यकीन किया जाए तो कांग्रेस के कुशाग्र प्रबंधकों ने काले धन के मामले में आड़वाणी की दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिसके परिणामस्वरूप निकलकर आया है ‘खेदपत्र‘।
खतरे में सुकुमार
दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित के सुकुमार समझे जाने वाले लोक कर्म विभाग के मंत्री राज कुमार चैहान के आसन पर खतरा डगमगा रहा है। भ्रष्टाचार के एक प्रकरण में दिल्ली के लोकायुक्त न्यायमूर्ति मनमोहन सरीन ने उन्हें दोषी मानते हुए भारत गणराज्य की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल से उन्हें पद से हटाने की सिफारिश कर दी है। इतना ही नहीं लोकायुक्त ने चैहान पर आपराधिक मामला चलाने की सिफारिश भी की है। जाहिर है इस कार्यवाही के बाद घपलों और घोटालों से घिरी शीला और कांग्रेस नेतृत्व पर नैतिक दवाब बढ़ गया है। गौरतलब होगा कि लोकायुक्त की इसी तरह की प्रतिकूल टिप्पणी के आधार पर कांग्रेस द्वारा कर्नाटक के निजाम येदिरप्पा से त्यागपत्र की मांग की जा रही है। लाख टके का सवाल यह है कि लोकायुक्त की सिफारिश पर महामहिम राष्ट्रपति का सचिवालय कब और क्या निर्णय सुनाता है?
वसुंधरा ही तार सकतीं हैं राजस्थान भाजपा को
रसातल की ओर अग्रसर भाजपा की राजस्थान इकाई में जान फूंकने के लिए अब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को वसुंधरा राजे सिंधिया से उपयुक्त दूसरा कोई प्रतीत नहीं हो रहा है। पिछले दिनों उन्हें राज्य में नेता प्रतिपक्ष के पद का आफर दिया गया था, जो उन्होंने विनम्रता के साथ ठुकरा दिया है। और अपनी ओर से नंदलाल मीणा का नाम सुझाया है। इस पद के लिए अन्य नामों में धनश्याम तिवाड़ी, गुलाबचंद कटारिया और वसुंधरा खेमे से राजेंद्र सिंह राठौर और डाॅ.दिगम्बर सिंह के नामों की चर्चा है। भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी चाहते हैं कि उन्हें सूबे की भाजपा का मुखिया बनाकर अगला चुनाव उनकी अगुआई में ही लड़ा जाए। इसके पीछे माना जा रहा है कि राजघराने से होने के बाद भी आज वसुंधरा का जनाधार औरों की अपेक्षा काफी तगड़ा और विधायकों में पकड़ बरकरार है। किन्तु समस्या यह है कि सूबे के मौजूदा अध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी का कार्यकाल अभी एक साल का बचा हुआ है।
अब आया है उंट पहाड़ के नीचे
इक्कीसवीं सदी में जमीन से उठकर स्वयंभू योग गुरू बनने वाले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने महज आठ सालों में धर्मार्थ संस्था के नाम पर कर बचाकर लाखों करोड़ों रूपयों की अकूत धन संपदा एकत्र कर ली, फिर चले राजनीति की काल कोठरी को स्वच्छ, निर्मल, धवल बनाने। जिसका पेट भरा होता है, वही गंदगी को दूर करने का प्रहसन किया करता है। फिल्म शोले का मशहूर डायलाग है – ‘‘अब आया है उंट पहाड़ के नीचे‘‘। इसी तर्ज पर अब कांग्रेस के सामने बाबा रामदेव आ चुके हैं। बाबा ने काले धन पर जमकर सियासत की। कांग्रेस ने भी अर्जुन की तरह निपुण धर्नुधर, चाणक्य की तरह दूरंदेशी वाले महासचिव राजा दिग्विजय सिंह को बाबा के सामने मैदान संभालने पाबंद किया है। अब दोनों ओर से बयानो के बाण चल रहे हैं। राजनैतिक समझबूझ वाले जानते हैं कि दिग्गी राजा के आगे बाबा रामदेव ज्यादा देर टिक नहीं पाएंगे।
आखिर उद्योगपति क्यों हैं सीबीआई के निशाने पर
केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अनिल अंबानी, वेणुगोपाल, शाहिद बलवा जैसी मशहूर हस्तियों की कालर पर हाथ डाला है तो निश्चित मान लिया जाए कि इसके पीछे कारण कुछ गहरा और बेक सपोर्ट बड़ा ही तगड़ा है। वरना किसी की क्या हिमाकत कि इन धनकुबेरों को बुलावा भेजा जाए वह भी साधारण मुलजिमों की तरह पूछताछ का। कहा जा रहा है कि अब बारी कुमार मंगलग बिरला और रतन टाटा की है। दस जनपथ के सूत्रों का कहना है कि देश के उद्योगपति कल तक कांग्रेस की हां में हां मिलाते आए हैं, किन्तु अब इनके द्वारा क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को आर्थिक रूप से सुदृढ कर कांग्रेस का सफायश किया जा रहा है। इसके साथ ही साथ इन शीर्ष उद्योगपतियों द्वारा समय समय पर कांग्रेस की व्यवस्था के खिलाफ अनर्गल प्रलाप भी किया गया है। यही कारण है कि दस जनपथ के इशारों पर सीबीआई ने इन्हें बुला भेजा और इशारों ही इशारों में इन्हें पैजामे के अंदर रहने का मशविरा भी दे डाला।
पुच्छल तारा
भारत में कौन कितना कमाता और कितना खर्च करता है इस बारे में कोई हिसाब किताब ही नहीं रखा जाता है, जबकि विदेशों में आय से अधिक संपत्ति पर कानून कड़े हैं और सरकारों की बाकायदा नजरें रहती हैं। लुधियाना से सुरभी ने एक ईमेल भेजा है। सुरभी लिखती हैं कि एक अमेरिकी और एक भारतीय आपस में बतिया रहे थे।
अमेरिकी: हमारे यहां हर नागरिक की औसत कमाई दस हजार डालर है और वह खर्च करता है सात हजार डालर।
हिन्दुस्तानी: बाकी बचे पैसों का वह क्या करता है?
अमेरिकी: यह उसका नितांत निजी मामला है, कि वह बचे पैसे का क्या करता है, हमारे यहां निजी मामलों में दखल नहीं दिया जाता है।
हिन्दुस्तानी: हमारे यहां हर नागरिक की औसत कमाई डेढ़ हजार रूपए है, और वह खर्च करता है पांच हजार रूपए।
अमेरिकी (हैरत के साथ): बाकी पैसे वह लाता कहां से है?
हिन्दुस्तानी: यह उसका सरदर्द और नितांत निजी मामला है। हमारे यहां भी किसी के निजी मामलों में कोई दखल नहीं देता है।


Monday, February 21, 2011

भारत का विदेशों में जमा काला धन

-तनवीर जाफरी
भारतवर्ष दुनिया की नज़रों में निश्चित रूप से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र एवं स्वाधीन हो गया। स्वतंत्रता के पश्चात राष्ट्र हितैषी नेताओं,अधिकारियों तथा देशभक्तों के समक्ष जहां उस समय इस विशाल राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाए जाने जैसी विशाल चुनौती थी वहीं इसी के समानांतर हमारे ही देश में वह शक्तियां भी साथ-साथ सक्रिय हो उठीं जिन्हें देश के विकास या देश की आम व गरीब जनता की आत्मनिर्भरता से अलग इस बात की िफक्र थी कि वे स्वयं किस प्रकार कम से कम समय में अधिक धन संपत्ति का संग्रह कर सकें। और ऐसी राष्ट्रविरोधी कही जा सकने वाली शक्तियों ने आज़ादी के तत्काल बाद से ही देश को लूटना व बेेचना शुरु कर दिया। आज जहां देशवासी 1947 के बाद व उससे पहले की स्वतंत्रता से जुड़ी तमाम घटनाओं से वािकफ हैं वहीं यही लोग उसी समय से यह भी भलीभांति जानते व सुनते आ रहे हैं कि देश के तमाम भ्रष्ट नेता,अधिकारी,व्यापारी तथा जमाखोरों व काला धन संग्रह करने वालों का पैसा स्विटज़रलैंड में अथवा स्विस बैंक में जमा है। अब धीरे-धीरे आम लोगों को मीडिया के माध्यम से ही यह भी पता चलने लगा है कि चूंकि स्विस बैंक की ही तरह खाता संबंधी पूर्ण गोपनीयता बरतने का काम और भी कई पश्चिमी देशों के कई बैंकों में किया जा रहा है लिहाज़ा ऐसा काला धन केवल स्विस बैंक में ही नहीं बल्कि और भी कई विदेशी बैंकों में जमा है। भारतीय अर्थव्यवस्था, यहां व्याप्त गरीबी व बेरोज़गारी,भारतीय कायदे-कानून तथा अपनी ज़रूरत के लिए विदेशी बैंकों से समय-समय पर कर्ज लेते रहने जैसे हालात नि:संदेह किसी भी भारतीय नागरिक को इस बात की इजाज़त नहीं देते कि वह अपने धन को भारत के बैंकों में जमा करने के बजाए विदेशी बैंकों में जाकर जमा करे। और वह भी केवल इसलिए कि उसका धन नाजायज़ व गलत तरीकों से इकट्ठा किया गया धन है जिसे वह दुनिया की नज़रों से सिर्फ इसलिए छुपा कर रखना चाहते हैं कि एक तो उसका धन सुरक्षित रह सके दूसरे यह कि वह भारतीय वित्तीय कानूनों से बचा रह सके और तीसरी बात यह कि वह स्वयं को बदनामी से बचाए रख सके। देखा भी यही जा रहा है कि पश्चिमी देशों के काला धन जमा करने वाले इन बैंकों में गोपनीयता बरकरार रखने के इस कद्र ऊंचे पैमाने निर्धारित किए गए हैं कि कम से कम अभी तक तो स्पष्ट रूप से किसी भी खातेदार का नाम व उसकी कुल जमाराशी का खुलासा होते िफलहाल तो नहीं सुना गया। हां कल को यदि विकीलीक्स जैसी वेबसाईट अथवा उस जैसी किसी अन्य खोजी पत्रकारिता के चलते कुछ नाम उजागर हो जाएं तो अलग बात है। ऐसे बैंक ‘काला धन शब्द को भी अपने तरीके से परिभाषित करते हैं। परंतु भारतवर्ष में विगत् कुछ महीनों से विदेशी बैंकों में जमा काले धन का मुद्दा इस कद्र गरमाया हुआ है कि गोया ऐसा प्रतीत होने लगा है कि इस विषय पर शोरगुल करने व हंगामा बरपा करने वालों को इस बात का पता चल चुका हो कि किस व्यक्ति का कितना धन किस देश के किस बैंक में जमा है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत जैसे देश के आर्थिक हालात कतई ऐसे नहीं कि देश इस प्रकार के नकारात्मक आर्थिक वातावरण का सामना कर सके। निश्चित रूप से भारत सरकार को इस विषय पर पूरी गंभीरता से काम करना चाहिए तथा विदेशों में जमा भारतीय काला धन यथाशीघ्र अपने देश में वापस लाने के प्रयास करने चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि ऐसे गैर कानूनी कामों में लिप्त लोगों को चाहे वह कितनी ही ऊंची हैसियत रखने वाले व्यक्ति क्यों न हों उन्हें कानून के अनुसार सकत सज़ा भी दी जानी चाहिए। ऐसे लोगों के नाम भी यथाशीघ्र उजागर किए जाने चाहिए ताकि देश की जनता यह समझ सके कि नेता, अभिनेता, अधिकारी, समाजसेवी या धर्मगुरु अथवा व्यापारी के रूप में दिखाई देने वाला यह व्यक्ति वास्तव में वह नहीं है जो दिखाई दे रहा है बल्कि साधु के भेष में शैतान नज़र आने वाला यह व्यक्ति देश का सबसे बड़ा दुश्मन है। अवैध धन की जमाखोरी करने वाले यही वह लोग हैं जिनके कारण भारतवर्ष को गरीब देश कहा जाने लगा है।
परंतु विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे को लेकर भारत में मची हाय-तौबा की आड़ में तमाम भारतीय नेता व राजनैतिक दल तथा राजनीति में पदापर्ण की नई-नई इच्छा पालने वाले तमाम नए चेहरे इस विषय पर कुछ इतने अधिक तर्क व दलीलें पेश कर रहे हैं तथा एक-दूसरे पर आरोप व प्रत्यारोप करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे कि न केवल काला धन विदेशों से वापस लाने जैसा गंभीर मुद्दा अपने मु य विषय से भटकता दिखाई देने लगा है बल्कि यह भी साफ ज़ाहिर होने लगा है कि इस मुद्दे को लेकर किए जाने वाले शोर-शराबे का मकसद वास्तव में विदेशों से काले धन की वापसी का कम बल्कि राजनैतिक रूप से व्यक्ति विशेष या दल विशेष को बदनाम करना अधिक है। संभवत: ऐसे लोग यह भलीभांति जानते हैं कि देश की साधारण जनता व आम मतदाता इस प्रकार की अफवाहों पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं तथा इनके पीछे भागने लग जाते हैं। वैसे भी 1986-1987 के मध्य का वह दौर राजनीतिज्ञों के लिए एक उदाहरण बन चुका है जबकि स्वीडन की बोफोर्स तोप सौदे में कथित रूप से ली गई दलाली के मुद्दे पर केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की चूलें हिल गई थीं। आरोप जडऩे में तथा दूसरों को बदनाम करने में महारत रखने वाले तत्कालीन महारथियों ने राजीव गांधी, अमिताभ बच्चन,अजिताभ बच्चन सहित कई लोगों को अपने अनर्गल आरोपों के घेरे में ले लिया था। परिणाम स्वरूप कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था और भारत में गठबंधन सरकार का दौर उसी दुर्भाग्यशाली समय से ही शुरु हुआ।
लगता है कि आगामी संसदीय चुनावों से पूर्व एक बार फिर परोपेगंडा महारथियों द्वारा देश में वैसे ही हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। मुख्‍य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी बार-बार न केवल केंद्र सरकार पर यह आरोप लगा रही है कि वह काला धन मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं करना चाह रही है। बल्कि भाजपा ने इस विषय में छानबीन करने के लिए एक टॉस्क फोर्स का गठन भी किया है। भाजपा की इस टॉस्क फोर्स ने यह दावा किया था कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी तथा कांग्रेस अध्यक्ष तथा यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी स्वयं विदेशों में काला धन जमा करने जैसे गंभीर व गैर कानूनी मामलों में लिप्त हैं तथा उनके कई विदेशी बैंकों में अपने खाते हैं। भाजपा की यह टॉस्क फोर्स यह पता करने का काम कर रही है कि किन-किन लोगों का किन-किन देशों के किन-किन बैंकों में कितना-कितना धन जमा है। इस सिलसिले में अपना तथा स्वर्गीय राजीव गांधी का नाम लिए जाने पर स्वयं सोनिया गांधी ने भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी को पत्र लिखा तथा अपने व अपने परिवार के ऊपर भाजपाईयों द्वारा लगाए जाने वाले इन आरोपों पर कड़ी आपत्ति जताई। सोनिया ने आडवाणी को लिखे पत्र में स्पष्ट रूप से दो टूक शब्दों में यह लिखा कि किसी भी विदेशी बैंक में उनका कोई खाता नहीं है। सोनिया गांधी के इस पत्र के जवाब में अडवाणी ने भी शिष्टाचार का परिचय देते हुए सोनिया गांधी को जवाबी पत्र लिखकर इस बात के लिए खेद जताया कि इस मामले में आपके परिवार का जि़क्र किया गया इसके लिए मुझे खेद है। अडवाणी ने यह भी लिखा कि गांधी परिवार की ओर से इस तरह की सफाई पहले दी गई होती तो अच्छा रहता।
अडवाणी द्वारा सोनिया गांधी से माफी मांगना या भाजपा द्वारा सोनिया गांधी के विरुद्ध किए गए दुष्प्रचार के लिए खेद जताना तो निश्चित रूप से एक शिष्टराजनीति का एक हिस्सा माना जा सकता है। शीर्ष नेताओं के बीच इस प्रकार की वार्ताओं,पत्रों व टेलीफोन पर होने वाली वार्ताओं की बातें कभी-कभी प्रकाश में आती रहती हैं। परंतु बिना किसी ठोस प्रमाण के बिना किसी आधार या सूचना के इस प्रकार सोनिया गांधी,स्व० राजीव गांधी या किसी भी अन्य व्यक्ति को दुष्प्रचारित करना यह आिखर कहां की नैतिकता है और इसे किस प्रकार की राजनीति कहा जाना चहिए? सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह कोई भी यदि कुसूरवार हों अथवा उनके विरुद्ध कोई ठोस प्रमाण हों तब अवश्य उन्हें आलोचना का निशाना बनाया जा सकता है व उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। परंतु देश की जनता को बेवजह गुमराह करना, देश के जि़ममेदार राजनैतिक नेताओं पर लांछन लगाकर खुद अपने व अपने दल के नेताओं पर लगे काले धब्बों को छुपाने का प्रयास करना सरासर अनैतिक है। इस प्रकार के बेबुनियाद शोरशराबे व आरोप-प्रत्यारोप की प्रवृति से साफ़ ज़ाहिर होता है कि विपक्ष किसी भी प्रकार के सच्चे या झूठे हथकंडों का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी विशेषकर सोनिया गांधी परिवार को बदनाम करने पर तुला है ताकि गांधी परिवार पर काला धन संग्रह व भ्रष्टाचार में इनकी संलिप्तता जैसा आरोप लगाने व इन्हें बदनाम करने के बाद कांग्रेस पार्टी आसानी से कमज़ोर हो जाएगी। नतीजन विपक्ष के लिए सत्ता तक पहुंचने की राह आसान हो जाएगी। शायद ठीक उसी तरह जैसे कि 1987 में बोफोर्स को लेकर हुए शोरशराबे के परिणामस्वरूप कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई थी और देश में राष्ट्रीयमोर्चा की सरकार का गठन संभव हो सका था।
प्रवक्ता से ...

Monday, February 14, 2011

सिर्फ एक दिन प्यार करें

वेलैंटाइन डे (14फरवरी) पर विशेषः
-संजय द्विवेदी
क्या प्रेम का कोई दिन हो सकता है। अगर एक दिन है, तो बाकी दिन क्या नफरत के हैं ? वेलेंटाइन डे जैसे पर्व हमें बताते हैं कि प्रेम जैसी भावना को भी कैसे हमने बांध लिया है, एक दिन में या चौबीस घंटे में। पर क्या ये संभव है कि आदमी सिर्फ एक दिन प्यार करे, एक ही दिन इजहार-ए मोहब्बत करे और बाकी दिन काम का आदमी बना रहे। जाहिर तौर पर यह संभव नहीं है। प्यार एक बेताबी का नाम है, उत्सव का नाम है और जीवन में आई उस लहर का नाम है जो सारे तटबंध तोड़ते हुए चली जाती है। शायद इसीलिए प्यार के साथ दर्द भी जुड़ता है और शायर कहते हैं दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।
प्रेम के इस पर्व पर आंखों का चार होना और प्रेम प्रस्ताव आज एक लहर में बदल रहे हैं। स्कूल-कालेजों में इसे खासी लोकप्रियता प्राप्त है। इसने सही मायने में एक नई दुनिया रच ली है और इस दुनिया में नौजवान बिंदास घूम रहे हैं और धूम मचा रहे है। भारतीय समाज में प्रेम एक ऐसी भावना है जिसको बहुत आदर प्राप्त नहीं है। दो युवाओं के मेलजोल को अजीब निगाह से देखना आज भी जारी है। हमारी हिप्पोक्रेसी या पाखंड के चलते वेलेंटाइन डे की लोकप्रियता हमारे समाज में इस कदर फैली है। शायद भारतीय समाज में इतने विधिनिषेध और पाखंड न होते तो वेलेंटाइन डे जैसे त्यौहारों को ऐसी सफलता न मिलती। किंतु पाखंड ने इस पर्व की लोकप्रियता को चार चांद लगा दिए हैं। भारत की नौजवानी अपने सपनों के साथ जी रही है किंतु उसका उत्सवधर्मी स्वभाव हर मौके को एक खास इवेंट में बदल देता है। प्रेम किसी भी रास्ते आए उसका स्वागत होना चाहिए। वेलेंटाइन एक ऐसा ही मौका है , आपकी आकांक्षाओं और सपनों में रंग भरने का दिन भी। सेंट वेलेंटाइन ने शायद कभी सोचा भी न हो कि भारत जैसे देश में उन्हें ऐसी लोकस्वीकृति मिलेगी।
बाजार में त्यौहारः
वेलेंटाइन के पर्व को दरअसल बाजार ने ताकत दी है। कार्ड और गिफ्ट कंपनियों ने इसे रंगीन बना दिया है। भारत आज नौजवानों का देश है। इसके चलते यह पर्व एक अद्भुत लोकप्रियता के शिखर पर है। नौजवानों ने इसे दरअसल प्रेम पर्व बना लिया है। इसने बाजार की ताकतों को एक मंच दिया है। बाजार में उपलब्ध तरह-तरह के गिफ्ट इस पर्व को साधारण नहीं रहने देते, वे हमें बताते हैं कि इस बाजार में अब प्यार एक कोमल भावना नहीं है। वह एक आतंरिक अनूभूति नहीं है वह बदल रहा है भौतिक पदार्थों में। वह आंखों में आंखें डालने से महसूस नहीं होता, सांसों और धड़कनों से ही उसका रिश्ता नहीं रहा, वह अब आ रहा है मंहगे गिफ्ट पर बैठकर। वह महसूस होता है महंगे सितारा होटलों की बिंदास पार्टियों में, छलकते जामों में, फिसलते जिस्मों पर। ये प्यार बाजार की मार का शिकार है। उसे और कुछ चाहिए, कुछ रोचक और रोमांचक। उसकी रूमानियत अब पैसे से खिलती है, उससे ही दिखती है। यह हमें बताती है कि प्यार अब सस्ता नहीं रहा। वह यूं ही नहीं मिलता। लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद की बातें न कीजिए, यह प्यार बाजार के उपादानों के सहारे आता है, फलता और फूलता है। इस प्यार में रूह की बातें और आत्मा की रौशनी नहीं हैं, चौधिंयाती हुयी सरगर्मियां हैं, जलती हुयी मोमबत्तियां हैं, तेज शोर है, कानफाड़ू म्यूजिक है। इस आवाज को दिल नहीं, कान सुनते हैं। कानों के रास्ते ये आवाज, कभी दिल में उतर जाए तो उतर जाए।
इस दौर में प्यारः
इस दौर में प्यार करना मुश्किल है और निभाना तो और मुश्किल। इस दौर में प्यार के दुश्मन भी बढ़ गए हैं। कुछ लोगों को वेलेंटाइन डे जैसे पर्व रास नहीं आते। इस अवसर पर वे प्रेमियों के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं। देश में अनेक संगठन चाहते हैं कि नौजवान वेलेंटाइन का पर्व न मनाएं। जाहिर तौर पर उनकी परेशानियों हमारे इसी पाखंड पर्व से उपजी हैं। हमें परेशानी है कि आखिर कोई ऐसा त्यौहार कैसे मना सकता है जो प्यार का प्रचारक है। प्यार के साथ आता बाजार इसे प्रमोट करता है, किंतु समाज उसे रोकता है। वह चाहता है संस्कृति अक्षुण्ण रहे। संस्कृति और प्यार क्या एक-दूसरे के विरोधी हैं ? प्यार, अश्ललीलता और बाजार मिलकर एक नई संस्कृति बनाते हैं। शायद इसीलिए संस्कृति के रखवाले इसे अपसंस्कृति कहते हैं। सवाल यह है कि बंधन और मिथ्याचार क्या किसी संस्कृति को समर्थ बनाते हैं ? शायद नहीं। इसीलिए नौजवान इस विधि निषेधों के खिलाफ हैं। वे इसे नहीं मानते, वे तोड़ रहे हैं बंधनों को। बना रहे हैं अपनी नई दुनिया। वे इस दुनिया में किसी के हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। वे चाहते हैं प्यार जिए और सलामत रहे। प्यार की जिंदाबाद लगे। बाजार उनके साथ है। वह रंग भर रहा है, उन्हें प्यार के नए फलसफे समझा रहा है। प्यार के नए रास्ते बता रहा है। इस नए दौर का प्यार भी क्षणिक है ,वह एक दिन का प्यार है। इसलिए वन नाइट स्टे एक हकीकत बनकर हमें मुंह चिढ़ा रहा है। ऐसे में रास्ता क्या है ? सहजीवन जब सच्चाई में बदल रहा हो। महानगर अकेले होते इंसान को इन रास्तों से जीना सिखा रहे हों। एक वर्चुअल दुनिया रचते हुए हम अपने अकेले होने के खिलाफ खड़े हो रहे हों तो हमारा रास्ता मत रोकिए। यह हमारी रची दुनिया भले ही क्षणिक और आभासी है, हम इसी में मस्त-मस्त जीना चाहते हैं। नौजवान कुछ इसी तरह से सोचते हैं। प्यार उनके लिए भार नहीं है, जिम्मेदारी नहीं है, दायित्व नहीं है, एक विनिमय है। क्योंकि यह बाजार का पैदा किया हुआ, बाजार का प्यार है और बाजार में कुछ स्थाई नहीं होता। इसलिए उन्हें झूमने दीजिए, क्योंकि इस कोलाहल में वे आपकी सुनने को तैयार नहीं हैं। उन्हें पता है कि आज वेलेंटाइन डे है, कल नई सुबह होगी जो उनकी जिंदगी में ज्यादा मुश्किलें,ज्यादा चुनौतियां लेकर आने वाली है- इसलिए वे कल के इंतजार में आज की शाम खराब नहीं करना चाहते। इसलिए हैप्पी वेलेंटाइन डे।
प्रवक्ता से

Tuesday, February 8, 2011

मिश्र को कुछ नहीं हासिल होनेवाला

लेखकःश्रीराम तिवारी
विगत दिनों मिश्र जाना हुआ. वहां की ऐतिहासिक इमारतें और जन-जीवन को देखने का मौका मिला। और फिर अचानक आ गया वहां क्रांति का सैलाब। इस परपेक्ष्य में प्रस्तुत है एक सामयिक लेख। साभार प्रवक्ता।
हीरालाल पांडेय
मिस्र में जो चल रहा है वो कुछ भी नामित हो किन्तु इसे क्रांति का नाम देना उचित नहीं होगा.विगत १० दिनों की राजनैतिक गतिविधियों का निचोड़ ये है की मिस्र का वर्तमान जानान्दोलन नितांत दिशाहीन और गृहयुद्ध पोषक है .इतने दिन मुबारक विरोधी सड़कों पर चिल्ल पों मचाते रहे किन्तु हुस्नी मुबारक ने संयम से काम लिया ;किन्तु जब देश से बाहर की अंतर्राष्ट्रीय ताकतों ने अपने मोहरे मिस्र की सरजमीं पर उतारने शुरू किये तो मुबारक समर्थक आवाम का धैर्य चुकने लगा और २ फरवरी को वे भारी तादाद में हुस्नी मुबारक के समर्थन में न केवल काहिरा बल्कि पूरे देश में सड़कों पर उतर आये , न केवल सड़कों पर उतर आये अपितु सेना के बैरीकेट्स तोड़कर तहरीर स्कायर पर जमा हो गए और नारा लगाया -लॉन्ग लीव हुस्नी मुबारक .स्थिरता सम्बन्धी हुस्नी मुबारक के कमिटमेंट पर वे यकीनी तौर पर आश्वस्त हैं अब इस विप्लवी माहौल को गृहयुद्ध नहीं तो क्या क्रांति कहेंगे ?
हुस्नी मुबारक की जगह शायद मोहम्मद अलबरदेई आ जाएँ ,या शायद कोई फौजी बन्दा सत्ता पर काबिज हो जाये किन्तु मिस्र की जनता की वास्तविक तकलीफें -महंगाई ,बेरोजगारी और उत्पीडन -कम होने की कोई गारंटी नहीं है ,ये विश्वव्यापी आर्थिक संकट का दौर है किसी एक व्यक्ति की जगह दूसरे को राष्ट्राध्यक्ष भर बना देने से व्यस्थाएं नहीं बदला करतीं .व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्रन्तिकारी आमूलचूल परिà ��र्तन आवश्यक है .इस तरह के दिशाहीन विचारहीन ,व्यक्तिपरक आन्दोलन अपनी ऊष्मा बरकार रखने में ही असफल होते रहे हैं ,क्योंकि इस आन्दोलन के पास वैज्ञानिक तरीके से समाज ,राजनीत या आर्थिक दुरावस्था से निपटने का कौशल नहीं होता .
हुस्नी मुबारक ही एकमात्र अरेवियन हैं जिन पर इजरायल को यकीन है और इसीलिये वे अमेरिका के भी विश्वाशपात्र है .अलबरदेई होंगे तो वे भी उसी घात के हैं .जहाँ तक फौजों का सवाल है तो यह जगजाहिर है की इस भूतल पर जितने भी फौजी शासक हैं या विगत ५० सालों में हुए हैं- वे सभी अमेरिकी धुन पर नाचने बाले कालबेलिए भर रहे हैं फिर मिस्र की जनता का यह वर्तमान विप्लवी उपसंहार कहाँ समाप्त होगा ?
वैसे भी हुस्नी मुबारक की उम्र ढल चुकी है वे ३० साल से सत्ता पर काबिज हैं ;किन्तु मिश्र की जनता जिस लोकतंत्र की मांग कर रही है वो तो एलेक्ट्रोरल की राह ही आ पायेगा .हुस्नी कह भी रहे हैं की आगामी आम चुनाव में मैं खड़ा नहीं होऊंगा और मौजूदा संविधान के तहत सत्ता परिवर्तन का आवाम को मार्ग भी प्रशस्तकर्ता हूँ ;किन्तु लोग हैं कि मुबारक को गद्दी छोड़ने का आह्वान कर रहे हैं .यह लगातार १० दिन त क चलने से तंग आकार अभी तक जो चुप थे और हुस्नी से खुश थे वे भी मैदान में आ गए और इस तरह एक प्रतिष्ठित राष्ट्र फिर से दो रहे पर खड़ा है .मिश्र कि जनता एक दुखांत अध्याय कि ओर अग्रसर है .
मिस्र के अंदरूनी संघर्ष से पूर्व फ़्रांस ,ट्यूनीसिया ,तुर्की तथा दुनिया के अनेक भू-भागों में वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट की धमक महसूस की गई और अब तो भारत भी इस की चपेट में आने वाला है .भारत सरकार ने पेट्रोल डीजल के दाम विगत वर्ष में २-३ बार बढ़ाये हैं अब ओपेक ने जब १०० डालर प्रति वेरल कच्चा तेल कर दिया तो महंगाई का आलम नाकाबिल-ए बर्दास्त हो जायेगा .तब भारत की जनता भी सडको पर उमड़ पड़ेगा और फिर एक अदद कोई दूसरा दल या व्यक्ति सत्तासीन हो जायेगा और मंहगाई -बेरोजगारी -कुव्यवस्था -भृष्टाचार ज्यों के त्यों बरकरार रहेंगे क्योंकि पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था में मुनाफा केंद्र में होता है और इंसानियत ,भूख ,न्याय सभी हासिये पर होते हैं .बिना वैज्ञानिक तौर तरीके से व्यवस्था परिवर्तन एक प्रपंच मात्र है जो शक्तिशाली प्रभु वर्ग के हित संवर्धन की कुंजी है .इसमें नाहक ही आम जनता और खासतौर से निर्धनजन स्वाहा होते रहते हैं .मिस्र या इजिप्ट में यही सब हो रहा है .वहाँ एक सकारात्मक क्रांति की अभी कोई संभावना नहीं .

Tuesday, October 26, 2010

सबसे मंहगे ग्लोबल ब्रॉण्ड हैंःबाबा रामदेव

जगदीश्वर चतुर्वेदी
वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।
मुझे बाबा रामदेव अच्छे लगते हैं। वे इच्छाओं को जगाते हैं आम आदमी में जीने की ललक पैदा करते हैं। भारत जैसे दमित समाज में इच्छाओं को जगाना ही सामाजिक जागरण है। जो लोग कल तक अपने शरीर की उपेक्षा करते थे, अपने शरीर की केयर नहीं करते थे, उन सभी को बाबा रामदेव ने जगा दिया है।
इच्छा दमन का कंजूसी के भावबोध, सामाजिक रूढ़ियों और दमित वातावरण से गहरा संबंध है। बाबा रामदेव ने एक ऐसे दौर में पदार्पण किया जिस समय मीडिया और विज्ञापनों से चौतरफा मन, शरीर और पॉकेट खोल देने की मुहिम आरंभ हुई है। यह एक तरह से बंद समाज को खोलने की मुहिम है जिसमें परंपरागत मान्यताओं के लोगों को बाबा रामदेव ने सम्बोधित किया है। परंपरागत भारतीयों को खुले समाज में लाना,खुले में व्यायाम कराना,खुले में स्वास्थ्य चर्चा के केन्द्र में लाकर बाबा रामदेव ने कारपोरेट पूंजीवाद की महान सेवा की है। बाबा रामदेव ने जब अपना मिशन आरंभ किया था तब उनके पास क्या था? और आज क्या है? इसे जानना चाहिए। आरंभ में बाबा रामदेव सिर्फ संन्‍यासी थे, उनके पास नाममात्र की संपदा भी नहीं थी आज वे पूंजीवादी बाजार के सबसे मंहगे ग्लोबल ब्रॉण्ड हैं। अरबों की संपत्ति के मालिक हैं। यह संपत्ति योग-प्राणायाम से कमाई गई है। इतनी बडी संपदा अर्जित करके बाबा रामदेव ने एक संदेश दिया है कि अगर जमकर परिश्रम किया जाए तो कुछ भी कमा सकते हो। कारपोरेट जगत की सेवा की जाए तो कुछ भी अर्जित किया जा सकता है।
बाबा ने एक ही झटके में योग-प्राणायांम का बाजार तैयार किया है। जड़ी-बूटियों का बाजार तैयार किया है। योग को स्वास्थ्य और शरीर से जोड़कर योग शिक्षा की नई संभावनाओं को जन्म दिया है। पूंजीवादी आर्थिक दबाबों में पिस रहे समाज को बाबा रामदेव ने योग के जरिए डायवर्जन दिया है। सामान्य आदमी के लिए यह डायवर्जन बेहद मूल्यवान है। जिसके कारण वह कुछ समय के लिए ही सही प्रतिदिन तनावों के संसार से बाहर आने की चेष्टा करता है। जिस समाज में आम आदमी को निजी परिवेश न मिलता हो उसे विभिन्न योग शिविरों के जरिए निजी परिवेश मुहैय्या कराना, एकांत में योग करने का अभ्यास कराना।जिस आदमी ने वर्षों से सुबह उठना बंद कर दिया था उस आदमी को सुबह उठाने की आदत को नए सिरे से पैदा करना बड़ा काम है।
नई आदतें पैदा करने का अर्थ है नई इच्छाएं पैदा करना। स्वयं से प्यार करने, अपने शरीर से प्यार करने की आदत डालना मूलतः व्यक्ति को व्यक्तिवादी बनाना है और यह काम एक संयासी ने किया है, जबकि यह काम बुर्जुआजी का था। बाबा रामदेव की सफलता यह है कि उन्होंने व्यक्ति के शरीर में पैदा हुई व्याधियों के कारणों से व्यक्ति को अनभिज्ञ बना दिया। मसलन किसी व्यक्ति को गठिया है तो उसके कारण हैं और उनका निदान मेडीकल में है लेकिन जो आदमी बाबा के पास गया उसे यही कहा गया आप फलां-फलां योग करें, प्राणायाम करें,आपकी गठिया ठीक हो जाएगी। अब व्यक्ति को योग और गठिया के संबंध के बारे में मालूम रहता है, गठिया के वास्तव कारणों के बारे में मालूम नहीं होता। बाबा चालाक हैं अतः मेडीकल में जो कारण बताए गए हैं उनका अपनी वक्तृता में इस्तेमाल करते हैं, जबकि बाबा ने मेडीकल साइंस की शिक्षा ही नहीं ली है। ऐसी अवस्था में उनका मेडीकल ज्ञान अविश्वसनीय ही नहीं खतरनाक है और इस चक्कर में वे एक ही काम करते हैं कि समस्या के वस्तुगत ज्ञान से व्यक्ति को विच्छिन्न कर देते हैं। इस तरह बाबा ने व्यक्ति का उसकी वस्तुगत समस्या से संबंध तोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली।
बाबा रामदेव की कामयाबी के पीछे एक अन्य बड़ा कारण है रामजन्मभूमि आंदोलन का असफल होना। भाजपा और संघ परिवार की यह चिन्ता थी कि किसी भी तरह जो हिन्दू जागरण रथयात्रा के नाम पर हुआ है उस जनता को किसी न किसी रूप में गोलबंद रखा जाए और उत्तरप्रदेश और देश के बाकी हिस्सों में राममंदिर के लेकर जो मोहभंग हुआ था, उसने हिन्दुओं के मानस में एक खालीपन पैदा किया था। इस खालीपन को बाबा ने खूब अच्छे ढ़ंग से इस्तेमाल किया और हिन्दुओं को गोलबंद किया।
राममंदिर के राजनीतिक मोहभंग को चौतरफा धार्मिक संतों और बाबा रामदेव के योग के विस्फोट के जरिए भरा गया। राममंदिर के मोहभंग को आध्यात्मिक-यौगिक ध्रुवीकरण के जरिए भरा गया। राममंदिर का सपना चला गया लेकिन उसकी जगह हिन्दू का सपना बना रहा है। विभिन्न संतों और बाबाओं की राष्ट्रीय आध्यात्मिक आंधी ने यह काम बड़े कौशल के साथ किया है।
हिन्दू स्वप्न को पहले राममंदिर से जोड़ा गया बाद में बाबा रामदेव के सहारे हिन्दू सपने को योग से जोड़ा गया। बाबा के लाइव टीवी कार्यक्रमों में हिन्दू धर्म का प्रचार स्थायी विषय रहा है। जबकि सच है कि योग-प्राणायाम की भारतीय परंपरा वह है जो चार्वाकों की परंपरा है। ये वे लोग रहे हैं जो नास्तिक थे, भगवान को नहीं मानते थे। हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज की अनेक बुनियादी मान्यताओं की तीखी आलोचना किया करते थे।
बाबा रामदेव ने बड़ी ही चालाकी और प्रौपेगैण्डा के जरिए योग को हिन्दूधर्म से जोड़ दिया है और यही उनका धार्मिक भ्रष्टाचार है। इस तरह बाबा रामदेव ने योग के साथ हिन्दूधर्म को जोड़कर योग से उसके वस्तुगत विचारधारात्मक आधार को ही अलग कर दिया है।
हम सब लोग जानते हैं कि बाबा रामदेव ने पतंजलि के नाम से सारा प्रपंच चलाया हुआ है लेकिन उनके प्रवचनों में व्यक्त हिन्दू विचारों का पतंजलि के नजरिए से दूर का संबंध है।
योग का सबसे पुराना ग्रंथ है ‘योगसूत्र’ । इसकी धारणाओं का हिन्दुत्व और सामयिक हिन्दू संस्कृति के प्रवक्ताओं की धारणाओं के साथ किसी भी किस्म का रिश्ता नहीं है। प्रसिद्ध दार्शनिक देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने लिखा है ‘वैदिक साहित्य में योग शब्द का अर्थ था जुए में बांधना या जोतना।’
अति प्राचीन युग से ही यह शब्द कुछ ऐसी क्रियाओं के लिए प्रयोग में लाया जाता था जो सर्वोच्च लक्ष्य के लिए सहायक थीं। अंततः यही इस शब्द का प्रमुख अर्थ बन गया। दर्शन में योग का गहरा संबंध पतंजलि के ‘योगसूत्र’ से है। जेकोबी का मानना ये पतंजलि वैय्याकरण के पंडित पतंजलि से भिन्न हैं। लेकिन एस.एन.दास गुप्त के अनुसार ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं। और उन्होंने इस किताब का रचनाकाल 147 ई.पू. माना है। जेकोबी ‘योगसूत्र’का रचनाकाल संभवतः540 ई. है। सांख्य और योग के बीच में गहरा संबंध है। हम सवाल कर सकते हैं कि आखिरकार बाबा रामदेव सांख्य-योग का आज के संघ परिवार के द्वारा प्रचारित हिन्दुत्व के साथ संबंध किस आधार पर बिठाते हैं? दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि पतंजलि के ‘योगसूत्र’ लिखे जाने के काफी पहले से लोगों में योग और उसकी क्रियाओं का प्रचलन था। डी.पी चट्टोपाध्याय ने लिखा है ‘‘ ‘योगसूत्र’ में वर्णित योग, मूल यौगिक क्रियाओं से बहुत भिन्न था। इस विचार में कोई नवीनता नहीं है। योग्य विद्वान इसे तर्क द्वारा गलत साबित कर चुके हैं। इनमें से कुछ विद्वानों का कहना है कि योग का प्रादुर्भाव आदिम समाज के लोगों की जादू टोने की क्रियाओं से हुआ।’’
एस.एन.दास गुप्त ने ‘ए हिस्टरी ऑफ इण्डियन फिलॉसफी’ में लिखा है ‘‘पतंजलि का सांख्यमत, योग का विषय है … संभवतः पतंजलि सबसे विलक्षण व्यक्ति थे क्योंकि उन्होंने न केवल योग की विभिन्न विद्याओं का संकलन किया और योग के साथ संबंध की विभिन्न संभावना वाले विभिन्न विचारों को एकत्र किया, बल्कि इन सबको सांख्य तत्वमीमांसा के साथ जोड़ दिया,और इन्हें वह रूप दिया जो हम तक पहुंचा है। पतंजलि के ‘योगसूत्र’ पर सबसे प्रारंभिक भाष्य, ‘व्यास भास’ पर टीका लिखने वाले दो महान भाष्यकार वाचस्पति और विज्ञानभिक्षु हमारे इस विचार से सहमत हैं कि पतंजलि योग के प्रतिष्ठापक नहीं बल्कि संपादक थे। सूत्रों के विश्लेषणात्मक अध्ययन करने से भी इस विचार की पुष्टि होती है कि इनमें कोई मौलिक प्रयत्न नहीं किया गया बल्कि एक दक्षता पूर्ण तथा सुनियोजित संकलन किया गया और साथ ही समुचित टिप्पणियां भी लिखी गईं।’’
यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि योग का आदिमरूप तंत्रवाद में मिलता है। दासगुप्त ने लिखा है कि योग क्रियाएं पतंजलि के पहले समाज में प्रचलित थीं। पतंजलि का योगदान यह है कि उसने योग क्रियाओं को ,जिनका नास्तिकों में ज्यादा प्रचलन था, तांत्रिकों में प्रचलन था, इन क्रियाओं को आस्तिकों में जनप्रिय बनाने के लिए इन क्रियाओं के साथ भाववादी दर्शन को जोड़ दिया।
डी.पी.चट्टोपाध्याय ने लिखा है ‘ये भाववादी परिवर्तन सैद्धांतिक और क्रियात्मक दोनों प्रकार के हुए।’ इस प्रसंग में आर. गार्बे ने लिखा है कि ‘‘ योग प्रणाली द्वारा सांख्य दर्शन में व्यक्तिगत ईश्वर की अवधारणा को सम्मिलित करने का उद्देश्य केवल आस्तिक लोगों को संतुष्ट करना और सांख्य द्वारा प्रतिपादित विश्व रचना संबंधी सिद्धांत को प्रसारित करना था। योग प्रणाली में ईश्वर संबंधी विचार निहित नहीं बल्कि उन्हें यूं ही शामिल कर लिया गया था।‘योगसूत्र’ के जिन अंशों में ईश्वर का प्रतिपादन हुआ है ,वे एक-दूसरे से असंबद्ध हैं और वास्तव में योगदर्शन की विषयवस्तु तथा लक्ष्य के विपरीत हैं। ईश्वर न तो विश्व का सृजन करता है और न ही संचालन। मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार पुरस्कार या दण्ड नहीं देता। ईश्वर में विलीन को मनुष्य (कम से कम प्राचीन योगदर्शन के अनुसार) अपने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानता… प्रत्यक्ष है कि ईश्वर का जो अर्थ हम लगाते हैं यह उस प्रकार के ईश्वर का मूल नहीं है और हमें काफी उलझे हुए विचारों का सामना करना पड़ता है जिनका लक्ष्य इस दर्शन के मूल नास्तिक स्वरूप को छिपाना तथा ईश्वर को मूल विचारों के अनुकूल जैसे तैसे बनाना है। स्पष्ट है कि ये उलझे हुए विचार इस बात को सिद्ध करते हैं कि यदि किसी प्रमाण की आवश्यकता हो तो वे वास्तविक योग में किसी व्यक्तिगत ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है।… किंतु योग प्रणाली में एक बार ईश्वर संबंधी विचार को सम्मिलित कर लेने के बाद यह आवश्यक हो गया कि ईश्वर और मानव जगत के बीच कोई संबंध स्थापित किया जाए क्योंकि ईश्वर केवल अपने ही अस्तित्व में बना नहीं रह सकता था। मनुष्य और ईश्वर के बीच का यह संबंध इस तथ्य को लाकर स्थापित किया गया कि जहां ईश्वर आपको इहलौकिक या नैसर्गिक जीवन प्रदान नहीं करता (क्योंकि वह तो व्यक्ति के सुकर्मों अथवा कुकर्मों के अनुसार मिलते हैं), वहां ईश्वर अपनी करूणा दिखाकर मनुष्य की सहायता करता है और यह मनुष्य उसके प्रति पूर्ण आस्था रखता है ताकि मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर हो सकें। किंतु ईश्वर में मानव की आस्था और दैवी कृपा पर आधारित यह क्षीण संबंध भी योग दर्शन में सम्मिलित होकर दुर्बोध सा प्रतीत होता है।’’ (एनसाइक्लोपीडिया आफ रिलीजन ऐंड एथिक्स, सं.जे. हेस्टिंग्स, एडिनबरा, 1908-18)
प्रवक्ता से साभार